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धुन का पक्का एक गधा भी पहुँचा पहन कमीज।

जंगल में घुड़दौड़


जंगल में घुड़दौड़ हुई तो पहुँचे घोड़े बीस।
धुन का पक्का एक गधा भी पहुँचा पहन कमीज।

खुद को घोड़ों संग देख गदहे ने मुँह को खोला।
भड़क उठे घोड़े जब उसने ढ़ेचूँ - ढ़ेचूँ बोला।

घोड़ों के सरदार ने कहा. सुनिए ओ श्रीमान।
गधा हमारे साथ रहे, ये हम सबका अपमान।

पीला, लाल किए मुँह घोड़े गये रेस से बाहर।
गदहे भैया बड़ी शान से दौड़े पूँछ उठाकर।

हिम्मत हारे नहीं गधे जी मेडल लेकर आए।
झूठी शान दिखाकर घोड़े बेमतलब पछताए।


- ज़ाकिर अली 'रजनीश'
मॉडरेटर- लज़ीज़ खाना, सर्प संसार

रोटी गिरतीं टप टप टप टप...

 
रोटी का पेड़
-निरंकार देव सेवक

रोटी अगर पेड़ पर लगती,
तोड़-तोड़ कर खाते।

तो पापा क्‍यों गेहूँ लाते,
और उन्‍हें पिसवाते।

रोज सवेरे उठकर हम,
रोटी का पेड़ हिलाते।

रोटी गिरतीं टप टप टप टप,
उठा उठा कर खाते।

दूध का कमाल Doodh Ka Kamaal

दूध का कमाल



पीकर गरम-गरम दुद्धू,
बुद्धू नहीं रहा बुद्धू।


खुले अकल के ताले सब,
नहीं अकल के लाले अब।


सुनकर अब अटपटे सवाल,
खड़े न होते सिर के बाल।


हर जबाब अब उसके पास,
सब उससे कहते शाबाश।

-नागेश पांडेय 'संजय'  

...वो कुंभकरन की पोती है।

एक कहानी कहनी है
-सुशील शुक्‍ल

एक कहानी कहनी है
वो जो आम की टहनी है

वहीं कहीं एक तोती है
जो दिन भर बस सोती है

दिन में कभी जगा दो तो
बड़ी देर तक रोती है

सभी परिन्‍दे कहते हैं
वो कुंभकरन की पोती है।

बिल्‍ली बोली चूहा से आओ बाँध दूँ राखी...

आओ बाँध दूँ राखी

बिल्ली बोली चूहा भय्या,
दे दो मुझको माफ़ी
आज पर्व है रक्षाबंधन,
आओ बांध दूँ राखी

बोला चूहा हाथ जोड़कर,
बहना अलबेली
तुम हो राजा भोज, और
मैं ठहरा गंगू तेली

राजा के मैं बनूँ बराबर
मेरी नहीं है इच्छा
घर जाने को सूर्पनखाजी
मांग रहा हूँ भिक्षा

सुनकर के यह भड़क उठी
बिल्ली ने पंजा मारा
होशियार था चूहा लेकिन
हो गया नौ-दो-ग्यारा।।
 

- जाकिर अलीरजनीश

बारात गई उड़!

Comrade Safdar.
मच्‍छर पहलवान
-सफ़दर हाशमी

बात की बात
खुराफ़ात की खुराफ़ात
 
बेरिया का पत्‍ता
सवा सत्रह हाथ
 उसपे ठहरी बारात
 
मच्‍छर ने मारी एड़
तो टूट गया पेड़
 
 पत्‍ता गया मुड़
 बारात गई उड़।

...गई पाँच के चक्‍कर में फिर दस हज़ार की गड्डी!

-डॉ0 मोहम्‍मद अरशद खान
 
बीच सड़क पर दिया दिखाई
पड़ा पाँच का सिक्‍का।
 
भालूमल जी लगे उठाने,
वहीं रोक कर इक्‍का।
 
हुई हड़बड़ी संभल न पाए,
फिसले टूटी हड्डी।
 
गई पाँच के चक्‍कर में फिर,
दस हज़ार की गड्डी।

बादल आया झूम के...

बादल आया
-शकुंतला सिरोठिया

बादल आया झूम के,
पर्वत चोटी चूम के।

इन्द्रधनुष का पहने हार,
ले आया वर्षा की धार।

मेंढ़क राजा मगन हुए,
झींगुर के सुख सपन हुए।

कजरी की धुन आती है,
नन्हीं चिड़िया गाती है।

दादीजी का चश्मा खोया

दादीजी का चश्मा



दादीजी का चश्मा खोया,
सबकी आफत आई.

सब मिल खोज रहे हैं फिर भी
पड़ा नहीं दिखलाई.

दादी अपने सर पर देखो,
मीना जब चिल्लाई.

राम राम फिर गजब हो गया

बंदर जी अखबार छापते, घर-घर जाकर स्‍वयं बॉंटते।

बंदर जी अखबार छापते
-डॉ0 अरूणेन्‍द्र चन्‍द्र त्रिपाठी अरूण

बंदर जी अखबार छापते, 
घर-घर जाकर स्‍वयं बॉंटते।

हाथी दादा के घर पहुँचे, 
लगे झॉंकने ऊपर - नीचे।

हाथी ने जब सूँड़ बढ़ायी, 
बन्‍दर ने अखबार थमाया।

शेर जमा था अपनी छत पर, 
बंदर कूदे नीचे ऊपर।

उन्‍हें देख आते गुर्राया, 
बंदर जी का सिर चकराया।

अखबार नहीं बाटूँगा आगे, 
यह कहते बंदर जी भागे।

यही चार तो होते हैं जी इस खिचड़ी के यार।

-उषा यादव-
खिचड़ी के यार

चिड़िया ले कर आई चावल
और कबूतर दाल।
बंदर मामा बैठे-बैठे
बजा रहे थे गाल।

चिड़िया और कबूतर बोले-
मामा, लाओ घी।
खिचड़ी में हिस्सा चाहो तो
ढूँढ़ो कहीं दही।

पहले से हमने ला रक्खे
पापड़ और अचार।
यही चार तो होते हैं जी
इस खिचड़ी के यार।।

आ पहुँचा जब शेर सामने, मची हाय रे दैया।


-विष्णुकांत पाण्डेय-
घोड़ा नाचे, हाथी नाचे,
नाचे सोन चिरैया।

किलक किलक कर बंदर नाचे,
भालू ता-ता-थैया।

ठुमक-ठुमक खरहा नाचे,
ऊंट, मेमना, गैया।

आ पहुँचा जब शेर सामने,
मची 'हाय रे दैया।'

चूहा कूदा गंगा जी में

–सूर्य कुमार पाण्डेय–

बिल्ली मौसी चलीं बनारस, लकर झोला–डंडा।
गंगा–तट पर मिला उन्हें तब मोटा चूहा पंडा।

चूहा बोला– बिल्ली मौसी, चलो करा दूं पूजा।
मुझ–सा पंडा, यहाँ घाट पर, नहीं मिलेगा दूजा।

बिल्ली बोली– ओ पंडा जी, भूख लगी है भारी।
पूजा नहीं, पेट पूजा की करो तुरन्त तैयारी।

समझ गया चूहा, बिल्ली मौसी का पंगा जी में।
टीका–चंदन छोड़ घाट पर कूदा गंगा जी में।

सैर-सपाटा


-विष्णुकांत पाण्डेय-

मोटर पर चढ़ बन्दर निकला,
करने सैर-सपाटा।

चौराहे पर खड़ी पुलिस को
उसने रूक कर डांटा।

बेवकूफ हट जा आगे से,
आती मेरी गाड़ी।

दबकर मर जाएगा नाहक,
कैसा निपट अनाड़ी।

मस्त कलंदर


बंदर-बंदर मस्त कलंदर
क्यों बैठे हो डाली पर ?


चलो उतरकर आओ अंदर,
काँप रहे हो तुम थर थर।


बंदर बोला- अरे मुछंदर,
कभी न मैं आऊँ अंदर।


डम-डम-डमडम डमरू ले कर
मुझे नचाओगे दिन भर।


-
सूर्य कुमार पाण्डेय

कठौती में गंगा


कहा बंदरिया ने बंदर से,
चलो नहाएं गंगा।

बच्चों को छोड़ेंगे घर में,
होने दो हुड़दंगा।

बंदर और बंदरिया दोनों,
भाग-भागकर आए।

किन्तु घाट पर डंडे के बल,
दोनों गए भगाए।

बन्दर बोला चलो दौड़कर,
यहाँ मचा है दंगा।

मन चंगा तो भरी कठौती,
बन जाती है गंगा।
-ड़ा0 राष्ट्रबंधु
A Hindi Children Poem (Shishu Geet) by Dr. Rastrabandhu