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...हालत मेरी खस्‍ता है।

 

हालत मेरी खस्‍ता है

-सूर्य कुमार पाण्‍डेय

टीचर जी, ओ टीचर जी,
हालत मेरी खस्‍ता है।

के जी टू में पढ़ती हूँ,
टू केजी का बस्‍ता है।

चलूँ सड़क पर रिक्‍शा वाला,
मुझे देख कर हँसता है।

एक सवारी और लाद लो,
ताने मुझपर कसता है।

बोझ किताबों का कम करिए,
बड़ी दूर का रस्‍ता है।

नन्‍हें फूलों पर क्‍यों रक्‍खा,
यह भारी गुलदस्‍ता है।

टीचर जी, ओ टीचर जी,
हालत मेरी खस्‍ता है।

...मानो चली छानकर भंग।

पतंग
-अश्‍वनी कुमार पाठक

नीली-पीली, लाल पतंग, उड़ती है बादल के संग।
नभ में मस्‍ती से लहराती, मानो चली छानकर भंग।

नीचे आती, गुटके खाकर, उठ जाती है, फिर सन्‍नाकर।
दाएँ-बाएँ शीश झुकाकर, ढील मिली चढ़ जाती चंग।

मोनू-सानू जल्‍दी आओ, सद्दी में मंझा लगवाओ।
चरखी में चढ़वा लो धागा, आज पतंगों की है जंग।

नीचे के काने में पुच्‍छी, और बीच में हो गलमुच्‍छी।
इससे सीखो ऊँचा उठना, इसके बड़े निराले ढंग।।

फूल बनकर मुस्कराना चाहिए


-रोहिताश्व अस्थाना

जिंदगी हंसकर बिताना चाहिए।
चुटकुले सुनना-सुनाना चाहिए।

रात-दिन आँसू बहाने से भला,
फूल बनकर मुस्कराना चाहिए।

चाट का ठेला खड़ा है सामने,
आज कुछ खाना-खिलाना चाहिए।

आ गया इतवार, पापा जी हमें,
आज तो सरकस घुमाना चाहिए।

एक सीमा तक करें शैतानियाँ,
ना किसी का दिल दुखाना चाहिए।

मास्टरजी हम पढ़ेंगे शौक से,
पर खिलौने कुछ दिलाना चाहिए।

देश को खुशहाल रखना है अगर,
हमको संसद में बिठाना चाहिए।

फूलों से होते हैं बच्चे, सच है ये। और सभी होते हैं अच्छे, सच है ये।


- डा0 अजय जनमेजय -

फूलों से होते हैं बच्चे, सच है ये।
और सभी होते हैं अच्छे, सच है ये।

इक पल रूठें तो दूजे पल हंसते हैं,
मानो मुस्कानों के लच्छे, सच है ये।

इनकी आँखों में खुद को पढ़ सकते हो,
दरपन जैसे बिलकुल सच्चे, सच है ये।

जो सोचें वो करके ही दम लेते हैं,
अपनी धुन के पूरे पक्के, सच है ये।

इतना खेलें भागे-दौड़ें सांस चढ़ी,
कब बैठे हैं फिर भी थक के, सच है ये।

मन के भोले दिल में भी तो भेद नहीं,
सब जैसे माना के मनके, सच है ये।

लाला जी की बड़ी तोंद है, घंटाघर की घड़ी तोंद है।


-सूर्यभानु गुप्त-

लाला जी की बड़ी तोंद है।
घंटाघर की घड़ी तोंद है।।

लाला जी से मिलो बाद में,
उनसे पहले खड़ी तोंद है।

कुरते में घुसने से पहले,
रोज लड़ाई लड़ी तोंद है।

बस में चढ़ते और उतरते,
दरवाजे में अड़ी तोंद है।

किसी अंगूठी में ज्यों हीरा,
लाला जी में जड़ी तोंद है।

बच्चे-बूढ़े सभी छुड़ाते,
हाथ लगी फलझड़ी तोंद है।

लड्डू-पेड़े से दिन होते, रसगुल्ले सी रातें।


-रोहिताश्व अस्थाना-

लड्डू-पेड़े से दिन होते, रसगुल्ले सी रातें।
तब कितना खुश होते हम सब मिलकर मौज मनाते।

गरम जलेबी से यदि होती अपनी शुरू पढ़ाई।
तब तो दिन भर में सचमुच सारी किताब पढ़ जाते।

गेंद सेब की होती, गन्ने का होता यदि बल्ला,
विकेट खूब लेते हम चौके-छक्के खूब बनाते।

मीठे आमों के बागों में पड़ते अगर पहाड़ा,
गणित हमें हलवा-सा लगता अच्छे नम्बर पाते।

सुबह-शाम मम्मी यदि देती हमको शक्करपारे,
तो हम कोयल के भाई बन बोली मधुर सुनाते।

सबको राह बताती तितली

आती तितली, जाती तितली।
रंगों में खो जाती तितली।
फूलों संग बतियाती तितली,
बच्चों की है प्यारी तितली।

कैसी अदभुत, कैसी न्यारी,
सब पर है यह वारी तितली।

रूप रंग सब कुछ हैं इसके,
मगर नहीं इठलाती तितली।

फूलों संग नाचो-गाओ,
है संदेशा देती तितली।
दुनिया कैसे सुंदर बनती,
सबको राह बताती तितली।

-शमशेर अहमद खान

A Hindi Children Poem (Bal gazal) by Shamsher Ahmad Khan