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वो गूगल में खोज रहा था, राम नाम है कैसे जपना।

बंदर ने देखा ये सपना

 
बंदर ने देखा ये सपना 
लैपटॉप है उसका अपना। 
वो गूगल में खोज रहा था 
राम नाम है कैसे जपना। 

बेटा बोला पापा छोड़ो 
फेसबूक में खाता खोलो 
सारा जंगल होगा अपना। 

तभी बंदरिया डंडा लाई 
लैपटॉप की करी पिटाई 
बोली ये दुष्मन है अपना। 

सब पेड़ों में मीठे फल हों 
सब नदियों में मीठा जल हो 
आंख खुली तो सोचे बंदर 
कैसे पूरा हो ये सपना।

अपनी भाषा हिन्‍दी है।

- डॉ0 मधुसूदन साहा - 

अपनी भाषा हिन्‍दी है
हर माथे की बिन्‍दी है।

जरा बोलकर देखो तु
कितनी सरस सुहानी है,
मां की लोरी-सी कोमल
रोचक नई कहानी है,

राधा के पग की पायल,
कान्‍हा की कालिन्‍दी है।

इसे राष्‍ट्र ने मान दिया
संविधान में अपनाकर,
अब दायित्‍व निभाना है
इसका पूरा सपना कर,

फिर निकालता रहता क्‍यों,
यूं 'हिन्‍दी की चिन्‍दी' है।

इसे सीखना चाहो तो
झट जुबान पर चढ़ जाती,
बस थोड़ी-सी चाहत से
दादी सब कुछ पढ़ पाती,

स्‍वेच्‍छा से सब सीख रहे
नहीं कहीं पाबंदी है।

पापा तुम लड़ना सीमा पर, बाकी चिन्ता मत करना।

पप्पू का पत्र 

धनसिंह मेहता ‘अनजान’ 

पापा तुम लड़ना सीमा पर, बाकी चिन्ता मत करना। 
देश बड़ा है जान है छोटी, जाँ की चिन्ता मत करना।। 

नजरें तुम सीमा पर रखना, दुश्मन छिपा शिखर पर है। 
तुम विचलित बिलकुल मत होना, देश तुम्हीं पर निर्भर है। 
मम्मी कहतीं- लिख पापा को, माँ की चिन्ता मत करना। 

चाचा की आयी थी चिट्ठी, चाची पहुँ गयीं झाँसी। 
घर में दीदी, माँ दादी है दादा जी को है खाँसी। 
दादा कहते-लिख पापा को, ‘बा’ की चिन्ताप मत करना। 

अबकी बारिश को छत पर का, पानी टपका चूल्हे’ में। 
सीढ़ी से दादी फिसली थीं, चोट लगी है कूल्हे में। 
दादी कहतीं-लिख पापा को, ‘माँ’ की चिन्ता मत करना। 

करनी है दीदी की शादी, दादा रिश्ता खोज रहे। 
अबकी जाड़े में रौनक हो, हम सब ऐसा सोच रहे। 
दीदी कहतीं-लिख पापा को, ‘हाँ’ की चिन्ता मत करना। 

घर को जब आओगे पापा, मुझको, हाथ घड़ी लाना। 
दादी का चश्मा ला देना, दादा हाथ छड़ी लाना। 
मैं लिखता हूँ तुमको पापा, ‘याँ’ की चिन्ता मत करना। 

Keywords: Dhan Singh Mehta Anjan, Balgeet, Hindi Bal Kavita, Deshbhakti Geet, Deshprem ki Kavitayen, Rashtraprem ke Geet, 

उसी पहाड़ी के ढ़लान पर...

चाह हमारी... 
प्रभात गुप्‍त 

छोटी एक पहाड़ी होती, झरना एक वहां पर होता 
उसी पहाड़ी के ढ़लान पर काश हमारा घर भी होता। 
 
बगिया होती जहां मनोहर खिलते जिसमें सुंदर फूल 
बड़ा मजा आता जो होता वहीं कहीं अपना स्‍कूल।

झरनों के शीतल पानी में घंटो खूब नहाया करते 
नदी पहाड़ों झोपडि़यों के सुंदर चित्र बनाया करते। 

होते बाग सेब चीकू के थोड़ा होता नीम बबूल 
बड़ा मजा आता जो होता वहीं कहीं अपना स्‍कूल। 

सीढ़ी जैसे खेत धान के और कहीं केसर की क्‍यारी 
वहां न होता शहर भीड़ का, धुआं उगलती मोटरगाड़ी।

सिर पर सदा घटाएं काली पांवों में नदिया के कूल 
बड़ा मजा आता जो होता वहीं कहीं अपना स्‍कूल।

आया राखी का त्‍यौहार

 
आया राखी का त्‍यौहार 
डॉ0 देशबंधु शाहजहाँपुरी 

खुशियों का लेकर उपहार
आया राखी का त्‍यौहार। 

जूही ने गेंदा, गुलाब के, 
तिलक लगा आशीष दिया। 

तब तक खुश्‍बू बिखराना तुम, 
जब तक चली न जाए बहार। 

होठों पर मुस्‍कान बिछाकर, 
बहनें बाँध रहीं राखी। 

नहीं चाहिए उनको कुछ भी, 
केवल माँगें प्‍यार-दुलार। 

प्‍यारे भइया जग-सागर में, 
खेना तुम रक्षा की नाव। 

दुख की भंवर मिले यदि कोई, 
छोड़ न देना तुम पतवार।

बाती-तेल जरूरी जैसे, दीपक और प्रकाश में...

 

पढ़ना बहुत जरूरी

-मुकुंद कौशल-

जेठ में जैसे धूप जरूरी, पानी ज्यों चौमास में
वैसे पढ़ना बहुत जरूरी, अपने पूर्ण विकास में।

गाँव कबीले जाग चुके हैं आगे यहाँ किसान सभी
रात गई अब हुआ सबेरा हों पूरे अरमान सभी

बाती-तेल जरूरी जैसे, दीपक और प्रकाश में
वैसे पढ़ना बहुत जरूरी, अपने पूर्ण विकास में।

अगर न समझे मूल्य समय का तो साधन कर सकते क्या
ज्ञान बिना पशुवत् है मानव ज्ञान बिना यह जीवन क्या

जीने को है साँस जरूरी, हवा जरूरी साँस में
वैसे पढ़ना बहुत जरूरी, अपने पूर्ण विकास में।

शब्द हमारे सुख के साथी सब मिलजुल कर पढ़ें-बढ़ें
जैसे भोजन बिना स्वाद का वैसे जीवन बिना पढ़े

खट्टापन जैसे अचार में, गुड़ जैसे मिठास में
वैसे पढ़ना बहुत जरूरी, अपने पूर्ण विकास में।

...गर्मी को पानी से धोएँ, बारिश को हम खूब सुखाएँ

 
उनका मौसम
देवेन्‍द्र कुमार

गर्मी को पानी से धोएँ
बारिश को हम खूब सुखाएँ

जाड़े को फिर सेंक धूप से
अपनी दादी को खिलवाएँ।

कैसा भी मौसम हो जाए
उनको सदा शिकायत रहती

इससे तो अच्‍छा यह होगा
उनका मौसम नया बनाएँ।

कम दिखता है, दाँत नहीं है,
पैरों से भी चल न पातीं

बैठी-बैठी रटती रहतीं
न जाने कब राम उठाएँ।

शुभ-शुभ बोलो प्‍यारी दादी,
 दर्द भूलकर हँस दो थोड़ा

आँख मूँदकर देखो अब तुम
 हम सब मिलकर लोरी गाएँ।

बाबा की बातें रंगीन

बातें हैं रंगीन
देवेन्‍द्र कुमार 

बाबा के हैं बाल सफेद
पर उनकी बातें रंगीन।

सुबह टहलने रोज निकलते 
अपने काम सभी खुद करते 
छत पर उनकी कसरत का तो 
मजेदार होता है सीन। 

हरदम कुछ-कुछ करते रहते 
दादी से बिन बात झगड़ते 
नकली दाँत दिखाकर पूँछे 
मुँह में दाँत बचे क्‍यों तीन। 

रोज कहानी हमें सुनाते 
अपने बचपन में ले जाते 
बोले, अब दुनिया घूमूँगा 
कल सपने में देखा चीन।

दिन सहमे-सिकुडे से लगते, रातें बडी लड़ैया....

जाड़े आये 

दिन सहमे-सिकुडे से लगते,
रातें बडी लडैया...
जाड़े आये भैया।

खींच-खींच सूरज की चादर,
रजनी पाँव पसारे।
काना फूँसी करें उघारे,
थर्..थर्..चन्दा-तारे।
धूप बेचारी ...हारी,
करती जल्दी गोल बिछैया...
जाड़े आये भैया।

लदे फदे कपडों में निकलें,
चुन्नू-मुन्नू भाई।
मम्मी के हाथों में नाचे,
दिन भर ऊन-सलाई।
किट्-किट्..करते दाँत,
कंठ से सी...सी दैया--दैया।
जाड़े आये भैया।

दुश्मन लगता ठण्डा पानी,
दोस्त है धूप सुनहली.
देर रात बैठे अलाव पर,
करते यादें उजली।
लगें अजनबी से अब तो,
ये नदिया ताल तलैया...।
जाड़े आये भैया।
अमरूदों ने मीठी-मीठी 
खुशबू है फैलाई।
गोभी, गाजर, मटर, टमामर 
ने बारात सजाई ।
गन्ने हो गये रस की गागर,
सरसों भूल-भुलैया...
जाड़े आये भैया।

खेलो, खालो, पढ लो सो लो,
अब तुम जी भर-भऱ के,
कोई काम करो मत भैया,
घबरा के डर-डर के ।
---सर्दी लग जायेगी ---कहते,
हारे बेशक मैया।
जाड़े आये भैया।

जूते की पुकार...

जूते की पुकार
रमेश तैलंग


फट गया हूं मैं तले से, कट गया हूं मैं गले से
लद गया मेरा जमाना, हो गया हूं अब पुराना
आ पड़ी है जान पर, रुकने लगे सब काम मेरे
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

एक बूढ़े दादा जी हैं, छोड़ते मुझको नहीं हैं
थक गया हूं रोज कहकर, चल रहा हूं बस घिसटकर
व्यर्थ ही, लगता, गए सब मिन्नतें, 'परनाम' मेरे
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

ऑपरेशन की जरूरत, है यही बचने की सूरत
देर कर दी और थोड़ी, जान जायेगी निगोडी
वो कबाड़ी भी न देगा चार पैसे दाम मेरे
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

अब नहीं मैं दूध पीता एक बच्‍चा...

 
माँ समझती क्यों नहीं है?
- रमेश तैलंग 

अब नहीं मैं दूध पीता एक बच्चा 
माँ समझती क्यों नहीं है?
 
 
चाहता हूं, मैं बिताऊं वक्त ज्यादा 
दोस्तों के बीच जा कर,
चाहता हूं, मैं रखूँ दो-चार बातें 
सिर्फ अपने तक  छुपाकर,
 
पर मेरे आगे से डर की श्याम छाया
दूर हटती क्यों नहीं है ?
 
छोड़ आया हूं कभी का बचपना, जो
सिर्फ जिद्दी, मनचला था,
हो गया है अब बड़ा सपना कभी जो
थाम कर उंगली चला था,
 
पर बड़ों की टोका-टोकी वाली आदत 
क्यों, बदलती क्यों नहीं है?

बूँदों में नाचूँ, पानी में भीगूँ और भिगाऊँ।

लगता है
-अश्‍वनी कुमार पाठक

लगता है उछलूँ पर्वत की चोटी पर चढ़ जाऊँ।
बादल बन चंदा संग खेलूँ लुक-छिप उसे छकाऊँ।

बूँदों में नाचूँ, पानी में भीगूँ और भिगाऊँ।
सागर की छाती पर दौड़ूँ लहरों में खो जाऊँ।

तितली बनकर उडूँ, फूल पर भौंरे सा मंडराऊँ।
चंचल-चपल गिलहरी बनकर, कुतर-कुतर फल खाऊँ।

मन करता है मेरा अंधे की आँखें बन जाऊँ।
रंग भरूँ जीवन में, सुंदर दुनिया उसे दिखाऊँ।

...करते रहते ता-ता धिन्‍ना।

छोटा होना बहुत बुरा है
-अश्‍वनी कुमार पाठक

भैया कहता मुझको पिन्‍ना। 
दीदी कहती कितना घिन्‍ना।

साथी मुझे बनाते घोड़ा, और लगाते कसकर कोड़ा।
क‍हते कितना मरियल-अडि़यल, सरपट चलता नहीं निगोड़ा।
गोलू, भोलू सदा पीठ पर, करते रहते ता-ता धिन्‍ना।

मुझको कहते सभी अनाड़ी, खुद को मानें मँजा खिलाड़ी।
खतरे से हो जहाँ खेलना, कर देते हैं मुझे अगाड़ी।
ढ़ोल बजाते ढम ढम ढम ढम, टमकी बोले तड़-तड़ दिन्‍ना।

सबकी नजरों का मैं काँटा, खाता रहता दिन भर चाँटा।
 छोटा होना बहुत बुरा है, कभी किसी ने दर्द न बाँटा।
 तंग बहुत करते हैं मुझको, छोटू-मोटू, बिन्‍नी-बिन्‍ना।

 भैया कहता मुझको पिन्‍ना। 
दीदी कहती कितना घिन्‍ना।

चुप रहना या पीछे हटना, लगे उन्‍हें अपनी तौहीन।

बुलबुल के बच्‍चे
-गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ

बुलबुल के थे अण्‍डे तीन।
उनसे निकले बच्‍चे तीन।

माँ उनको नादान समझती,
लेकिन वे हैं बड़े जहीन।

कल तक देख नहीं पाते थे,
चीं चीं चीं चीं चिचियाते थे।

लेकिन आज इरादे उनके,
उड़ जाएं लंका या चीन।

लगने लगा घोंसला छोटा,
दाने दुनके का भी टोटा।

चोंच खोल चिल्‍लाते रहते,
खाने के बेहद शौकीन।

जब कोई भी आहट आती,
गर्दन तान फुलाते छाती।

चुप रहना या पीछे हटना,  
लगे उन्‍हें अपनी तौहीन।

बादल जी, बोलो क्‍या तुम भी पढ़ने जाया करते हो?

बादल जी, बोलो क्‍या तुम भी पढ़ने जाया करते हो?
या फिर केवल गड़-गड़-गड़ शोर मचाया करते हो? ?

सुबह-सुबह मुझको तो मेरी मम्‍मी रोज जगा देती,
अलसाई आँखों से मीठे सपने दूर भगा देती,

देर हुई विद्यालय मे तो टीचर अलग सजा देती,
कहो, किसी से सजा कभी क्‍या तुम भी पाया करते हो?

सुनते हैं तुमको ऊपर से सारी दुनिया दिखती है,
बोलो, क्‍या सचमुच ऊपर से प्‍यारी दुनिया दिखती है?

फूलों जैसी सुंदर राजकुमारी दुनिया दिखती है ?
जिसपर तुम अपने आँचल की ठण्‍डी छाया करते हो?
नील गगन में रहते हो तुम तो हो जाते सैलानी,
प्‍यारी धरती के होठों को छूकर हो जाते पानी,

 कभी-कभी तो तुम्‍हें देखकर होने लगती हैरानी,
 इन्‍द्रधनुष के रंग किस तरह तुम बिखराया करते हो?

परी, कभी मेरे घर आना।

परी, कभी मेरे घर आना
-राजनारायण चौधरी

परी, कभी मेरे घर आना।

आना अपनी पॉंखें खोले,
उड़ती उड़ती हौले हौले,

आ मुझसे घुम मिल बतियाना।
परी, कभी मेरे घर आना।
 
सुघड़ दूधिया गोटे वाली,
जिसमें कढ़ी हुई हो जाली,

चूनर वह तन पर लहराना।
परी, कभी मेरे घर आना।
 
इंद्रधनुष के रंग चुराकर,
दे जाना धरती पर आकर,

तितली जैसे तुम इठलाना।
परी, कभी मेरे घर आना।
 
सैर करेंगे हम उपवन की,
बातें होंगी दूर गगन की,

मैं नाचूँगा, तुम कुछ गाना।
परी, कभी मेरे घर आना।
 
रात ढ़ले चॉंदनी झरे जब,
 कोई ऑंखों नींद भरे जब,

 लोरी गाकर मुझे सुलाना।
परी, कभी मेरे घर आना।

मेरे द्वारे बहुत पुराना, पेड़ खड़ा है पीपल का।

-श्‍यामसुंदर श्रीवास्‍तव 'कोमल

मेरे द्वारे बहुत पुरानापेड़ खड़ा है पीपल का। 

मैं तो बैठ पढ़ा करता हूँ, इसकी शीतल छाँव में। 
इसके जैसा पेड़ नहीं है, दूजा कोई गाँव में।

बाकी सबके सब छोटे हैं, बरगद हो या कटहल का। 
मेरे द्वारे बहुत पुरानापेड़ खड़ा है पीपल का। 

पंचों की चौपाल सदा ही, लगती है इसके नीचे। 
बैठ यहीं पर करते संध्‍या, बाबा आँखों को मींचे। 

दादी रोज चढ़ाती इस पर भरा हुआ लोटा जल का। 
मेरे द्वारे बहुत पुरानापेड़ खड़ा है पीपल का। 

साँझ-सकारे इसमें आकर पंछी शोर मचाते हैं।
चिहुँक-चिहुँक कर फुदक-फुदक कर, मीठा गीत सुनाते हैं।

तुम भी इसे देखने आना, पेड़ बड़ा है पीपल का।
 मेरे द्वारे बहुत पुरानापेड़ खड़ा है पीपल का।

साल शुरू हो दूध दही से, साल खत्म हो शक्कर घी से।

-भवानी प्रसाद मिश्र-

साल शुरू हो दूध दही से
साल खत्म हो शक्कर घी से।

पिपरमैंट, बिस्कुट मिसरी से
रहें लबालव दोनों खींसे।।

मस्त रहें सड़कों पर खेलें
ऊधम करें मचाएँ हल्ला
रहें सुखी भीतर से जी से।

साँझ, रात, दोपहर, सवेरा
सबमें हो मस्ती का डेरा।

कातें सूत बनाएँ कपड़े,
दुनिया में क्यों डरें किसी से।

पंछी गीत सुनाये हमको
बादल बिजली भाये हमको
करें दोस्ती पेड़ फूल से ।

लहर-लहर से नदी-नदी से
आगे पीछे ऊपर नीचे।
रहें हंसी की रेखा खींचे।

पास पड़ौस गाँव घर बस्ती
प्यार ढेर भर करें सभी से।

बातों-बातों में ही तुमने, मारे डंक बहत्तर जी ।


सुनो-सुनो ओ मच्छर जी।
हो तुम कितने निष्ठुर जी।

बातों-बातों में ही तुमने,
मारे डंक बहत्तर जी ।

नन्हे नाजुक लगते हो,
पर दिल के पूरे पत्थर जी।

पाठ पढे़ ना दया-धरम का,
हो तुम निपट निरक्षर जी ।

पढ़ने दो ना लिखने दो,
ना कहीं चैन से सोने दो।

करके रखा नाक में दम,
यह ठीक नहीं है मिस्टर जी।

कछुआ-वछुआ मार्टिन-आर्टिन,
सब उपाय बेकार हुए।

मच्छरदानी में भी आ जाते
हो, कितने मट्ठर जी ?

लेकिन एक बात पर अपनी,
अकल खा रही चक्कर जी।

क्या मिलता है तुम्हें खून में,
घुली हुई क्या शक्कर जी ?

हम धरती के फूल, हमीं हैं खुश्बू वाले झरने।


-कृष्ण शलभ-
हम धरती के फूल, हमीं हैं खुश्बू वाले झरने।

उड़े हवा के पंख लगा कर, कोई क्या उड़ पाए।
गुस्सा होती दादी अम्मा हमें देख हंस जाए।

बिना हमारे दादी माँ को घर भर लगे अखरने।
अम्मा की लोरी, बाबा की किस्सों भरी ‍िकताब।

चाचा नेहरू की अचकन के हम ही रहे गुलाब।
जहाँ–जहाँ हम जाएं भैया मस्ती लगे बिखरने।

सूरदास केहमीं कन्हैया हम तुलसी के राम।
वीर शिवा, बन्दा बैरागी सभी हमारे नाम।

हम कच्ची मिट्टी हैं जैसा चाहो लगे संवरने।