-राधेश्याम प्रगल्भ-
धरती माँग रही है पानी, बादल बरसो।
फूटे अंकुर मिले जवानी, बादल बरसो।
पहनेगी यह चूनर धानी, बादल बरसो।
बहल जाएगी गुडिया रानी, बादल बरसो।
भीगेंगे हम सब फुहार में, बादल बरसो।
रंग आ जाएगा बहार में, बादल बरसो।
गाएगा कोई मल्हार में, बादल बरसो।
रोगी मुस्कान बुखार में, बादल बरसो।
फूलों पर मुस्कान खिलेगी, बादल बरसो।
बच्चों की टोली किलकेगी, बादल बरसो।
गली गली धारा मचलेगी, बादल बरसो।
कागज की नौका तैरेगी, बादल बरसो।
देख रहे हम कब से राहें, देखो, बरसो।
खड़े हुए फैलाए बाँहें, देखो, बरसो।
पूरी होंगी अनगिन चाहें, देखो, बरसो।
तुम पर हसरत भरी निगाहें, देखो, बरसो।



