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होली तुमसे यही शिकायत

होली तुमसे यही शिकायत 
-उषा यादव

होली, तुमसे यही शिकायत, करते बच्चे हम।
इम्तहान के दिनों दौड़कर आती क्यों छम-छम?

मां कहतीं बस बहुत हो गया, अब रख दो पिचकारी।
यदि बुखार आ गया कहीं तो होगी मुश्किल भारी।
पर अपना मन रमे रंग में क्या ज्यादा, क्या कम,
इम्तहान के दिनों दौड़कर आती क्यों छम-छम?

गुब्बारे पानी वाले भी हमको बहुत लुभाएं।
सबके ऊपर उन्हें फेंक कर हम बच्चे हषाएं।
लेकिन नल के पास पहुँचते पड़े डांट क्या कम,
इम्तहान के दिनों दौड़कर आती क्यों छम-छम?

इम्तहान का भूत, पर्व का मजा बिगाड़े आधा। 
और उधर ढ़ोलक की थापें, दें पढ़ने में बाधा।
खी-खी करके तुम हंसती हो, कुछ तो करो शरम, 
इम्तहान के दिनों दौड़कर आती क्यों छम-छम?

किसने सीख तुम्हें दी गंदी, इन्हीं दिनों आने की?
हम बच्चों के मौज-मजे को फीका कर जाने की?
हल्ला्-गुल्ला , धूम-धड़ाका करे खूब फिर हम,
इम्तहान के दिनों दौड़कर आती क्यों छम-छम?

यही चार तो होते हैं जी इस खिचड़ी के यार।

-उषा यादव-
खिचड़ी के यार

चिड़िया ले कर आई चावल
और कबूतर दाल।
बंदर मामा बैठे-बैठे
बजा रहे थे गाल।

चिड़िया और कबूतर बोले-
मामा, लाओ घी।
खिचड़ी में हिस्सा चाहो तो
ढूँढ़ो कहीं दही।

पहले से हमने ला रक्खे
पापड़ और अचार।
यही चार तो होते हैं जी
इस खिचड़ी के यार।।

गुस्सा हैं हम, जाओ जी


–उषा यादव–

बिल्कुल नहीं आज मानेंगे, चाहे लाख मनाओ जी।
गुस्सा हैं हम, जाओ जी।

हर इतवार हमें चि‍डियाघर, चलने का लालच देंगे।
और उसी दिन दुनिया भर के कामों को फैला लेंगे।

बुद्धू हमें समझ रखा है, चाकलेट सेबहलाते।
टूटी आस लिये हम बच्चे, खड़े टापते रह जाते।

नहीं खायेंगे,नहीं खायेंगे, टाफी लाख खिलाओ जी।
गुस्सा हैं हम, जाओ जी।

झूठ अगर बच्चे बोलें तो, खूब डांट वे खाते हैं।
यही काम पापाजी करते, और साफ बच जाते हैं।

मम्मी बच्चों के दल में मिल, इनको डाँट लगाओ तुम।
वरना तुम से भी कुट्टी है, दूर यहाँ से जाओ तुम।

मुँह फूला ही रखेंगेअब, चाहे लाख हंसाओ जी।
गुस्सा हैं हम, जाओ जी।

रात हो गई


आसमान की छत पर देखो, तारों की बरसात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई।

चूँ–चूँ करती चिडिया सोई, दानों के सपनों में खोई।
ऊंघ रहे बरगद दादा भी, पत्ता हिल न रहा है कोई।

कब तक टीवी देखोगे तुम, यह तो गंदी बात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई।

घड़ी देख लो, रक्खी आगे, समय बहुत तेजी से भागे।
इतना छोटा बच्चा कोई, क्या पड़ोस में अब तकजागे?

पर जो इसकी आदत डालें, समझो उसकी मातहो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई।

यही रीतियदि पड़ जाएगी, नींद न जल्दी फिर आएगी।
उधर सुबह होते ही मम्मी, बन अलार्मतुमको जगाएगी।

बिगड़ा मूड, समझ लो दिन की, कुढ़न भरी शुरूआत हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई।

आ पहुंचेगा रिक्शेवाला, होगा फिर अच्छा घोटाला।
जब तक तुमने जूते ढ़ूंढे, खो जाऐगा मोजा काला।

इसको पाया, उसको खोया, यही रोज की बात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई।

बस्ता लेकर तुम भागोगे, सीढ़ी पर जब पहूँचे होगे।
अरे, टिफिन तो लिया नहीं है, झुंझलाहट होगी, लौटेगे।

सोचो तो, गड़बड़झाले की यह पूरी बारात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई।
–उषा यादव
A Hindi Children Poem (Bal Geet) by Usha Yadav