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बच्चे हिन्दुस्तान के

बच्चे हिन्दुस्तान के। चलते सीना तान के।
तानसेन की तरह गा रहे, नया तराना शान से।

हम किरणों जैसा चमकाते, कण कण के इतिहास को।
हम विलास को छोड़ मोड़ते, वैभवपूर्ण विलास को।

हमने अपने रथ के घोड़े, रक्खे हरदम तान के।
भाग्य बनाते अपने सबके, बंजर रेगिस्तान के।

तानसेन की तरह गा रहे, नया तराना शान से।

शीत चाँदनी जैसे हम हैं, पूर्णमासी लक्ष है।
नहीं अमावस्या में अटके, मंजिल दूर समक्ष है।

गीता गायन करते रहते, कर्म प्रमुखता मान के।
तानसेन की तरह गा रहे, नया तराना शान से।

कठौती में गंगा


कहा बंदरिया ने बंदर से,
चलो नहाएं गंगा।

बच्चों को छोड़ेंगे घर में,
होने दो हुड़दंगा।

बंदर और बंदरिया दोनों,
भाग-भागकर आए।

किन्तु घाट पर डंडे के बल,
दोनों गए भगाए।

बन्दर बोला चलो दौड़कर,
यहाँ मचा है दंगा।

मन चंगा तो भरी कठौती,
बन जाती है गंगा।
-ड़ा0 राष्ट्रबंधु
A Hindi Children Poem (Shishu Geet) by Dr. Rastrabandhu

अक्ल की खोज


-डा0 राष्ट्रबंधु

भैया 'अकल' कहाँ मिलती है?

परेशान हैं बहुत पिताजी। मुझसे हैं हैरान गुरूजी।
मुझे चिढ़ाते मेरे साथी। अकल नहीं है सब्जी-भाजी।
क्या गोली जैसी पिलती है? भैया 'अकल' कहाँ मिलती है?

सब कहते हैं अकल नहीं है। क्या उसकी दूकान कहीं है?
सब कहते दिमाग में खोजो। चोर बजारी अरे यहीं है।
तलुओं की चमड़ी छिलती है। भैया 'अकल' कहाँ मिलती है?

मेहनत होती टाँय-टाँय फिस्स। थक जाने पर होती है रिश।
रिश्वत कितनी देनी पड़ती। किसकी चलती वहाँ सिफारिश।
सिर की यह दुनिया हिलती है। भैया 'अकल' कहाँ मिलती है?

मीटर से क्या नापी जाती। अन्दाजन क्या आँकी जाती।
किसी तराजू पर तुलती है। परमिट से क्या टाँकी जाती?
सबकी जो किस्मत खुलती है। भैया 'अकल' कहाँ मिलती है?