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मेरा सपना कितना अच्‍छा....

मेरा सपना कितना अच्‍छा 
-रजनीकांत शुक्‍ल-

मेरा सपना कितना अच्‍छा, 
हे ईश्‍वर हो जाए सच्‍चा। 

बिना पढ़े ही इम्‍तहान में, 
आएं नंबर सबसे ज्‍यादा। 

रोज के मेरे खेलकूद में, 
कोई नहीं पहुंचाए बाधा। 

सभी कहें मुझे प्‍यारा बच्‍चा। 
मेरा सपना कितना अच्‍छा। 

मेरी कभी किसी गलती पर, 
मार न बिलकुल पड़ने पाए। 

मम्‍मी जी मुझको खुश होकर, 
मनचाहे सामान दिलाएं। 

और कभी पापाजी मुझको, 
साथ लिए बाजार घुमाएं। 

मन में मेरे ऐसी इच्‍छा। 
मेरा सपना कितना अच्‍छा।

...नुक्‍कड़ पर महफिल लग जाती।

 

स्‍कूल की वैन 

डॉ. रामनिवास मानव 

वैन स्‍कूल की जब भी आती, बच्‍चों में हलचल मच जाती। 
भाग-दौड़ करते हैं बच्‍चे, देरी से डरते हैं बच्‍चे।
 
लगे रमन को बस्‍ता भारी, बस में चढ़ने की लाचारी। 
भूला नवल टिफिन ही लाना, जूतों की पॉलिश करवाना।
 
मोनू की ढ़ीली है टाई, कैसे काम चलेगा भाई। 
निम्‍मी भूली बैज लगाना, पर मुश्किल अब घर से लाना।

सुमन का होमवर्क अधूरा, जाने कैसे होगा पूरा। 
गुस्‍से में हैं मम्‍मी-पा, डाँट रहे हैं खोकर आपा।

कंडक्‍टर ने बस को रोका, उत्‍पाती बच्‍चों को टोका। 
ठीक नहीं है मारा-मारी, सभी सढ़ेंगे बारी-बारी।

जब भी वैन स्‍कूल कीआती, नुक्‍कड़ पर महफिल लग जाती। 
लगते सुभग-सलोने बच्‍चे, जैसे सजे खिलौने बच्‍चे।।

क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये?

 
क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये ? 
अश्‍वनी कुमार पाठक 

क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये ? 
किस अलबेले चित्रकार से, तुमने पंख रंगाये ? 

क्‍यों कहते हैं बच्‍चे तुमको, तितली, तितली रानी? 
क्‍यों लगती तुम उनको इतनी, प्‍यारी और सुहानी? 

तुम्‍हें देखकर मुन्‍ना-मुन्‍नी, नन्‍हें हाथ बढ़ाते। 
 पंख तुम्‍हारे चुटकी में, आते-आते रह जाते। 

तुम फूलों पर बैठ-बैठ कर, मीठा रस पीती हो। 
 भौरों से बतियाती रहती, मस्‍ती में जीती हो।

...आओ खेलें होली।


आओ खेलें होली

-कृष्‍णेश्‍वर डींगर

 

आओ बनाएँ टोली,
हिल-मिल खेलें होली।

रंगों से भर झोली,
हाथों में ले रोली।

जमकर करें ठिठोली,
बचें न भोला-भोली।

घर-घर बने रंगोली,
कोठी हो या खोली।

कोई भाषा या बोली,
मिल-‍जुल खेलें होली।

मूस जी मुसटन्‍डा...

मूस जी मुसटन्‍डा

-कृष्‍णेश्‍वर डींगर


मूस ही मुस्‍टंडा,
लिये हाथ में डंडा।

बिल्‍ली बोली म्‍याऊँ,
किस चूहे को खाऊँ।

मूस ही मुस्‍टंडा,
गिरा हाथ से डंडा।

बिल्‍ली जी के आगे,
पूँछ दबाकर भागे।

मूस ही मुस्‍टंडा,
रह गया बाहर डंडा।

घुस गये जाकर बिल में,
चूहों की महफिल में।

रंग बदलने में मोटू जी, गिरगिटान के भाई।

 
गिरगिटान के भाई।
-कृष्‍णेश्‍वर डींगर 

कभी पहनते कुर्ता टोपी, 
कभी सूट नेक टाई। 
रंग बदलने में मोटू जी, 
गिरगिटान के भाई। 
कभी हमारी टीम पकड़ कर, 
बैट्स मैन बन जाते। 
कभी हमारे ही विरोध में, 
बॉलर बन कर आते। 
कोई उनको कहता मोटू, 
कोई कहता बबलू। 
कोई उनको कहता गोलू, 
मैं कहता दल-बदलू।

...जाड़ा तन मन लूट रहा है।


 
जाड़ा बुरा है मेरे भाई
-प्रत्‍यूष गुलेरी

बूढ़ों पर सच आफत आई।
जाड़ा बुरा है मेरे भाई।।

मन लगता न आज कहीं है।
दुश्‍मन खाना बना दही है।

दाँत घड़ी से टिक टिक बजते।
आग मिले सुख साँसें भरते।

ठिठुर-ठिठुर दम टूट रहा है।
जाड़ा तन मन लूट रहा है।

धूप खिले तो दौड़े आएँ।
मुट्ठी भर तन को गरमाएँ।।

पापा! गर मैं चिड़िया होता।

पापा! गर मैं चिड़िया होता

दीनदयाल शर्मा


पापा! गर मैं चिड़िया होता
बिन पेड़ी छत पर चढ़ जाता।

भारी बस्ते के बोझे से 
मेरा पीछा भी छुट जाता।

होमवर्क ना करना पड़ता
जिससे मैं कितना थक जाता।

धुआँ-धूल और बस के धक्के 
पापा! फिर मैं कभी न खाता।

कोई मुझको पकड़ न पाता
दूर कहीं पर मैं उड़ जाता

कौन नकल करता अब किसकी कैसे हम बतलाएँ।

कौआ उतरा है मुँडेर पर
-रमेश चंद्र शाह

कौआ उतरा है मुँडेर पर
और कंधे पर नाना
एक दूसरे में दोनों ने
जाने क्‍या पहचाना।

गर्दन घुमा-घुमा कौऐ को
देख रहा है नाना
कौन आ गया है यह मुझसा
दाना और सयाना।

गर्दन घुमा-घुमा कर कागा
काँव-काँव करता है
हिला-हिला सिर अपना यह भी
हाँव-हाँव भरता है।

एक दूसरे को बढ़-चढ़कर
दोनों पाँव दिखाएँ
कौन नकल करता अब किसकी
कैसे हम बतलाएँ।

कैसी ज्‍योतिष विद्या लेकर ये पंडित जी आए?

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कैसी ज्‍योतिष विद्या लेकर ये पंडित जी आए?
निरंकार देव सेवक

एक ज्‍योतिषी सड़क किनारे पोथी को फैलाकर
बता रहे थे भाग्‍य किसी का ज्‍योतिष गणित लगाकर

अगले वर्ष तुम्‍हारे घर में दो बच्‍चे खेलेंगे,
इसी माह में केतु उदय है राहु अस्‍त हो लेंगे।

दस दिन में कुनबे का कोई खो भी जा सकता है,
पर शनि के प्रभाव से घर भी वापिस आ सकता है।

तभी एक लड़के ने आकर कहा ज्‍योतिषी जी से,
पुत्र तुम्‍हारा गिरा कुएँ में उठो चलो जल्‍दी से।

भाग्‍य पूछने वालों के सिर यह सुनकर चकराए,
कैसी ज्‍योतिष विद्या लेकर ये पंडित जी आए?

अपने बेटे के भविष्‍य का जिनको पता नहीं था,
भाग्‍य-भविष्‍य दूसरों का वे बतला सकते हैं क्‍या?

बादल जी, सबकी प्‍यास बुझाओ।

Cute cartoon Sun with umbrella Vector Illustration
-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
सागर से गागर भर लाते, बादल काले-काले।
लाते साथ हवा के घोड़े दम-खम, फुर्ती वाले।

कभी खेत में, कभी बाग में, कभी गाँव में जाते।
कहीं निकलते सहमे-सहमे, कहीं दहाड़ लगाते।

कहीं छिड़कते नन्‍हीं बूँदें, कहीं छमा-छम पानी।
कहीं-कहीं सूखा रह जाता, जब करते नादानी।

जहाँ कहीं भी जाते बादल, मोर पपीहा गाते।
सब के जीवन में खुशियों के इन्‍द्रधनुष बिखराते।

बड़े प्‍यार से कहती धरती, आओ बादल आओ।
 तुम अपनी जल की गागर से सबकी प्‍यास बुझाओ।

प्‍यारी नानी

प्‍यारी नानी
त्रिलोक सिंह ठकुरेला

कितनी प्‍यारी बूढ़ी नानी, हमें कहानी कहती है।

जाते हम छुट्टी के दिन में, दूर गाँव वह रहती है।

उनके आँगन लगे हुए हैं तुलसी और अमरूद, अनार।

और पास में शिव का मंदिर पूजा करतीं घंटे चार।

हमको देती दूध, मिठाई, पूड़ी खीर बनाती हैं।

कभी शाम को नानी हमको खेत दिखाकर लाती हैं।

कभी कभी हमको समझातीं जब हम करते नादानी।

पैसे देकर चीज दिलातीं कितनी प्‍यारी हैं नानी।।

गुडिया रानी हुई सयानी


गुडिया रानी हुई सयानी
सुरेश सपन

मेरी गुडिया रानी देखो, जब से हुई सयानी।
घर भर में करती फिरती है नई नई शैतानी।

मम्‍मी जब खाना लाती है, इधर उधर छिप जाती है।
ऑंख बचाकर दूध मलाई झटपट चट कर जाती है।
 पकड़े जाने पर हंसती है, शैतानों की नानी।
घर भर में करती फिरती है नई नई शैतानी।

पहन के चश्‍मा दादी जी का, सब पर रौब जमाती है।
दादा जी की छड़ी दिखाकर, बच्‍चों को धमकाती है।
नहीं मानती बात किसी की, करती है मनमानी।
घर भर में करती फिरती है नई नई शैतानी।

पढ़ने में भी तेज बहुत है, पहला नम्‍बर पाती है।
खेल कूद में सबसे आगे, रहकर मेडल लाती है।
उसकी बुद्धि पर होती है, हम सबको हैरानी।
घर भर में करती फिरती है नई नई शैतानी।

जुगनू : डॉ0 अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

-डॉ0 अल्लामा इक़बाल-

सुनाऊँ तुम्हें बात एक रात की,
कि वो रात अंधेरी थी बरसात की।

चमकने से जुगनु के था इक समाँ,
हवा में उड़ें जैसे चिनगारियाँ।

पडी़ एक बच्चे की उस पर नज़र,
पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर।

चमकदार कीडा़ जो भाया उसे,
तो टोपी में झटपट छुपाया उसे।

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा,
‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा।

ख़ुदा के लिए छोड़ दे, छोड़ दे,
मेरे कै़द के जाल को तोड दे।'


'करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक,
कि देखूँ न दिन में तेरी मैं चमक।'

'चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम,
उजाले में वो तो हो जाएगी गुम।

न अल्हड़पने से बनो पायमाल,
समझ कर चलो- आदमी की सी चाल।'

कितना हरा भरा हूं मैं, कितना खिला खिला हूं मैं।

जंगल की पुकार

कितना हरा भरा हूं मैं ।
कितना खिला खिला हूं मैं।
मेरे अंदर इक संसार।
पक्षी उड़ते पंख पसार।

भांति- भांति के पशु यहां।
जड़ी बूटियां यहां वहां।
मेरे कारण वर्षा आए ।
राह बाढ़ की भी रुक जाए।

औषधि का मुझ में भंडार।
काग़ज़ लकड़ी का मैं द्वार।
इतना सब कुछ मैं देता हूं ।
फिर भी डर में ही जीता हूं ।

जाने कब ये मानव आएँ
पेड़ कटे, पंक्षी उड़ जाएँ।
पशु मेरे बेघर हो-हो कर ।
भटके यहाँ वहाँ रो-रो कर।

हे मानव ! मुझ को काटोगे।
वर्षा का सुख ले न सकोगे।
बाढ़ नहीं फिर रोक सकोगे।
स्वच्छ हवा को भी तरसोगे।
सुख से जीना है यदि बच्चो।
मुझ को भी सुख से जीने दो ।
-इस्मत ज़ैदी- 

हल्ला हुआ गली दर गल्ली। तिल्ली सिंह ने जीती दिल्ली।।

-रामनरेश त्रिपाठी-
पहने धोती कुरता झिल्ली।
गमछे से लटकाये किल्ली।।

कस कर अपनी घोड़ी लिल्ली।
तिल्ली सिंह जा पहुँचे दिल्ली।।

पहले मिले शेख जी चिल्ली।
उनकी बहुत उड़ाई खिल्ली।।

चिल्ली ने पाली थी बिल्ली।
बिल्ली थी दुमकटी चिबिल्ली।।
 
उसने धर दबोच दी बिल्ली।
मरी देख कर अपनी बिल्ली।।

गुस्से से झुँझलाया चिल्ली।
लेकर लाठी एक गठिल्ली।।

उसे मारने दौड़ा चिल्ली।
लाठी देख डर गया तिल्ली।।

तुरत हो गयी धोती ढिल्ली।
कस कर झटपट घोड़ी लिल्ली।।

तिल्ली सिंह ने छोड़ी दिल्ली।
हल्ला हुआ गली दर गल्ली।
तिल्ली सिंह ने जीती दिल्ली।।

किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।


-सफदर हाशमी-


किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।

 
किताबें करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक-एक पल की।
ख़ुशियों की, ग़मों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की।
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें ?

किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।
किताबों में चिड़िया चहचहाती हैं
किताबों में खेतियाँ लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं
परियों के किस्से सुनाते हैं
किताबों में राकेट का राज़ है
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों में कितना बड़ा संसार है
किताबों में ज्ञान की भरमार है।

क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।

लगते हैं केले के पत्ते, हाथी जैसे कान



-सुरेश विमल-
लगते हैं केले के पत्ते, हाथी जैसे कान।

पीपल के पत्तों की होती चूहे जैसी पूँछ,
ताड़-वृक्ष के पत्ते लगते रावण की सी मूँछ।
पात कमल के देख-देख आता कछुए का ध्यान।

दिखते हैं खटमल जैसे पत्ते हैं इमली के,
सेही के शरीर से होते पत्ते नागफनी के।
पात खजूरों के लगते हैं तरकस के-से बान।

बढ़ा-बढ़ा नाखून, चबाना उन्हें दांत से, छी: छी:



-सुरेश विमल-

बढ़ा-बढ़ा नाखून, चबाना उन्हें दांत से, छी: छी:
बड़-बड़े बालों में पंजें डाल खुजाना, छी: छी:

केले खाकर छिलके देना फेंक सड़क पर, छी: छी:
मक्खी भरे खोमचों से खा लेना चीजें, छी: छी:

मैले कपड़े पहन घूमना नहीं नहाना, छी: छी:
दातुन-कुल्ला किए बिना ही बिस्कुट खना, छी: छी:

धूल भरी गलियों में जाकर दौड़ लगाना, छी: छी:
गंदे पानी में कागज की नाव चलाना, छी: छी:

बछड़ा बोला गाय से- काम चलेगा चाय से।





-सूर्य कुमार पाण्डेय-
बछड़ा बोला गाय से
दूध नहीं पीना मुझको,
काम चलेगा चाय से।

बिल्ली बोली शेर से
ठीक समय पहुंचो स्कूल,
क्यों आते हो देर से।

बंदर बोला भेड़ से
मामा अगर कहा मुझको,
कूद पड़ूंगा पेड़ से।

हाथी बोला ऊँट से
प्यास बुझाऊं मैं कैसे,
पानी के दो घूँट से।