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छुई-मुई सी नाजु़क हो तुम, किसने नखरे तुम्हें सिखाए?

दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।

इन्द्रधनुष से पंख सजा, या फूलों से रंग चुराए?
छुई-मुई सी नाजु़क हो तुम, किसने नखरे तुम्हें सिखाए?

परियों जैसे पंख तुम्हारे, कैसे हैं? असली या नकली?
दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।

फूल-फूल का रस पीती हो, रस पर ही मानो जीती हो।
यह व्रत किसके लिए साधतीं, किस प्रिय की तुम मन चीती हो?

चुपके-चुपके क्यारी-क्यारी किसको ढुँढ़ा करतीं इकली?
दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।

पलतीं सदा बहारों में तुम, जहाँ न कोई दिखता है ग़म।
फिरभी पनप न पाती हो क्यों, चिंतित सी लगती हो हरदम?

किस अभाव के कारण ऐसी बनी हुई हो दुबली-पतली?
दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।

गुचपुप फूलों से बतियातीं, हमें दूर से ही ललचातीं।
बड़ी खूबसूरत छलना हो, छूना चाहें तो उड़ जातीं।

पुष्पपुरी की स्वप्न-परी हो अथवा कुदरत की कठपुतली?
दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।

-बाल कृष्ण गर्ग-

रेनी डे भई रेनी डे।

छुट्टी के हैं हथकंडे,
रेनी डे भई रेनी डे।

बरखा नहीं निगोड़ी है,
गरमा गरम पकौड़ी है।
इक्के एक, न दुक्के दो
सोमू बोले छक्के छे।

पानी बरसे छम छम छम
छोड़ो भी अगड़म-बगड़म।
बड़ी-बड़ी बौछारों के
बादल बरसाता डंडे।

इन्द्रधनुष सतरंगे हैं
सपने रंग-बिरंगे हैं।
खुशियाँ मना रहे बच्चे
करते हैं हर-हर गंगे।

समझो मत ऐसे-वैसे
बरसें बूंदों के पैसे।
पर भागो क्यों पढ़ने से,
छीलो क्यों आलू-बंडे।

-यश मालवीय-

....ढ़िंग्चक ढ़िंग्चक पानी बरसा।

खोल दिया मेंढ़क टोली ने, हर गड्ढे़ में एक मदरसा।
ढ़िंग्चक ढ़िंग्चक पानी बरसा।

भाँति-भाँति के बादल नभ में, धमा चौकड़ी लगे मचाने।
खो-खो और कबड्डी जैसे, खेलों के खुल गए खजाने।
लगता हर बिजली का रेला, अट्टहास उनका निर्झर सा।
ढ़िंग्चक ढ़िंग्चक पानी बरसा।
पाकर वर्षा जल का प्यार मिट्टी में नव अंकुर फूटे।
दौड़ लगाते नदिया नाले, तालाबों के छक्के छूटे।

देख धरा पर हरियाली को, फिर कोई भी मोर न तरसा।
ढ़िंग्चक ढ़िंग्चक पानी बरसा।
दिशा-दिशा में हलचल उभरी, पुछी उड़े पतंगों जैसे।
पुरवाई के हंसमुख झोंके, लगते नई उमंगों जैसे।

इन्द्रधनुष के तन जाते ही, छवियों का अभिवादन सरसा।
ढ़िंग्चक ढ़िंग्चक पानी बरसा।

-जगदीश चन्द्र शर्मा-

बादल भइया, बरसो मुसलाधार।

-अनुराधा विमल-

बादल भइया, विनती करती, सुन लो मेरी पुकार।
रिमझिम-रिमझिम ना बरसो, तुम बरसो मुसलाधार।

वरना रेनी-डे की छुट्टी होगी नहीं हमारी,
झिपझिप बरसोगे तो भइया होगी फिर लाचारी,

द्वार खुलेंगे स्कूलों के जायेंगे मन मार।
रिमझिम-रिमझिम ना बरसो, तुम बरसो मुसलाधार।

नहीं जरूरी रात-रात भर, गरजो या तड़को,
दिन भर भी आराम करो, हम कहते कब बरसो,

लेकिन प्रात: इतना बरसो रहे आर या पार।
रिमझिम-रिमझिम ना बरसो, तुम बरसो मुसलाधार।