-अनुराधा विमल-
बादल भइया, विनती करती, सुन लो मेरी पुकार।
रिमझिम-रिमझिम ना बरसो, तुम बरसो मुसलाधार।
वरना रेनी-डे की छुट्टी होगी नहीं हमारी,
झिपझिप बरसोगे तो भइया होगी फिर लाचारी,
द्वार खुलेंगे स्कूलों के जायेंगे मन मार।
रिमझिम-रिमझिम ना बरसो, तुम बरसो मुसलाधार।
नहीं जरूरी रात-रात भर, गरजो या तड़को,
दिन भर भी आराम करो, हम कहते कब बरसो,
लेकिन प्रात: इतना बरसो रहे आर या पार।
रिमझिम-रिमझिम ना बरसो, तुम बरसो मुसलाधार।



