दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।
इन्द्रधनुष से पंख सजा, या फूलों से रंग चुराए?
छुई-मुई सी नाजु़क हो तुम, किसने नखरे तुम्हें सिखाए?
परियों जैसे पंख तुम्हारे, कैसे हैं? असली या नकली?
दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।
फूल-फूल का रस पीती हो, रस पर ही मानो जीती हो।
यह व्रत किसके लिए साधतीं, किस प्रिय की तुम मन चीती हो?
चुपके-चुपके क्यारी-क्यारी किसको ढुँढ़ा करतीं इकली?
दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।
पलतीं सदा बहारों में तुम, जहाँ न कोई दिखता है ग़म।
फिरभी पनप न पाती हो क्यों, चिंतित सी लगती हो हरदम?
किस अभाव के कारण ऐसी बनी हुई हो दुबली-पतली?
दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।
गुचपुप फूलों से बतियातीं, हमें दूर से ही ललचातीं।
बड़ी खूबसूरत छलना हो, छूना चाहें तो उड़ जातीं।
पुष्पपुरी की स्वप्न-परी हो अथवा कुदरत की कठपुतली?
दूर-दूर क्यों रहतीं हमसे, मुँह खोलो, कुछ बोलो तितली।
-बाल कृष्ण गर्ग-



