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रोटी गिरतीं टप टप टप टप...

 
रोटी का पेड़
-निरंकार देव सेवक

रोटी अगर पेड़ पर लगती,
तोड़-तोड़ कर खाते।

तो पापा क्‍यों गेहूँ लाते,
और उन्‍हें पिसवाते।

रोज सवेरे उठकर हम,
रोटी का पेड़ हिलाते।

रोटी गिरतीं टप टप टप टप,
उठा उठा कर खाते।

कैसी ज्‍योतिष विद्या लेकर ये पंडित जी आए?

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कैसी ज्‍योतिष विद्या लेकर ये पंडित जी आए?
निरंकार देव सेवक

एक ज्‍योतिषी सड़क किनारे पोथी को फैलाकर
बता रहे थे भाग्‍य किसी का ज्‍योतिष गणित लगाकर

अगले वर्ष तुम्‍हारे घर में दो बच्‍चे खेलेंगे,
इसी माह में केतु उदय है राहु अस्‍त हो लेंगे।

दस दिन में कुनबे का कोई खो भी जा सकता है,
पर शनि के प्रभाव से घर भी वापिस आ सकता है।

तभी एक लड़के ने आकर कहा ज्‍योतिषी जी से,
पुत्र तुम्‍हारा गिरा कुएँ में उठो चलो जल्‍दी से।

भाग्‍य पूछने वालों के सिर यह सुनकर चकराए,
कैसी ज्‍योतिष विद्या लेकर ये पंडित जी आए?

अपने बेटे के भविष्‍य का जिनको पता नहीं था,
भाग्‍य-भविष्‍य दूसरों का वे बतला सकते हैं क्‍या?

अगर-मगर


-निरंकार देव सेवक

अगर-मगर दो भाई थे, लड़ते खूब लड़ाई थे।

अगर मगर से छोटा था, मगर मगर से खोटा था।
अगर अगर कुछ कहता था, मगर नहीं चुप रहता था।

बोल बीच में पड़ता था, और अगर से लड़ता था।
अगर एक दिन झल्लाया, गुस्से में भरकर आया।

और मगर पर टूट पड़ा, हुई खूब गुत्थमगुत्था।
छिड़ी महाभारत मारी, गिरी मेज-कुर्सी सारी।

माँ यह सुनकर घबराईं, बेलन ले बाहर आईं।
दोनों के दो-दो जड़कर, अलग दिए कर अगर-मगर।

खबरदार जो कभी लड़े, बंद करो ये सब झगड़े।
एक और ओर था अगर अड़, मगर दूसरी ओर खड़ा।

किताबों के कीड़े


बाल गीत

तुम बनो किताबों के कीड़े, हम खेल रहे मैदानों में।

तुम घुसे रहो घर के अंदर, तुमको है पंडित जी का डर।
हम सखा तितलियों के बनकर, उड़ते फिरते उद्यानों में।

तुम रटो रात-दिन अंगरेजी, कह ए-बी-सी-डी-ई-एफ-जी।
हम तान मिलाते हैं कू-कू, करती कोयल की तानों में।

हम रहते फूलों कलियों में, तुम रहते गन्दी गलियों में,
हम खेल रहे बन ती-ती-ती, तुम सड़ते रहो मकानों में।

तुम दुबले-पतले दीन-हीन, हम में तुम जैसे बनें तीन।
हम शैतानों के नेता है, पर पास सदा इम्तहानों में।

तुम लिए किताबों का बोझा, हम उछल-कूद खाते गोझा।
तुममें हममें है भेद वही, जो मूर्खों और विद्वानों में।
-निरंकार देव सेवक
A Hindi Children Poem (Bal Geet) by Nirankar Dev Sewak