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देख खुली कमरे की खिड़की, चुपके से घुस आती है।


- संभव शर्मा -


यह ठण्डी जब आती है
हमको बहुत सताती है


सूरज से पर डरती है,
देख उसे छुप जाती है।


हवा सहेली पक्की है,
उसके संग इठलाती है।



पानी के संग मिलकरके,
काट हमें वह खाती है।


देख खुली कमरे की खिड़की,
चुपके से घुस आती है

माँ से उसकी बड़ी दुश्मनी,
कम्बल, टोप उढ़ाती है