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दूँगी फूल कनेर के


आना मेरे गाँव, तुम्हें मैं दूँगी फूल कनेर के।

कुछ कच्चे, कुछ पक्के घर हैं, एक पुराना ताल है।
सड़क बनेगी सुनती हूं, इसका नम्बर इस साल है।

चखते आना टीले ऊपर कई पेड़ हैं बेर के।
आना मेरे गाँव, तुम्हें मैं दूँगी फूल कनेर के।

खडिया, पाटी, कापी, बस्ते, लिखना-पढ़ना रोज है।
खेलें-कूदें कभी न फिर तो यह सब लगता बोझ है।

कई मुखौटे तुम्हें दिखाऊंगी, मिट्टी के शेर के।
आना मेरे गाँव, तुम्हें मैं दूँगी फूल कनेर के।

बाबा ने था पेड़ लगाया, बापू ने फल खाए हैं।
भाई कैसे, उसे काटने को रहते ललचाए हैं।

मेरे बचपन में ही आए दिन कैसे अन्धेर के।
आना मेरे गाँव, तुम्हें मैं दूँगी फूल कनेर के।

हंसना-रोना तो लगता ही रहता है हर खेत में।
रूठे, कुट्टी कर लो, लेकिन खिल उठते हैं मेल में।

मगर देखना क्या होता है, मेरी चिट्ठी फेर में।
आना मेरे गाँव तुम्हें मैं दूँगी फूल कनेर के।
-अनन्त कुशवाहा
A Hindi Children Poem (Bal Geet) by Anant Kushwaha

तीन तलैया


-अनन्त कुशवाहा
अक्का बक्का तीन तलैया, जो जीते वह मेरा भैया।

दौड़ो, पीपल छूकर आओ, आकर मुझसे हाथ मिलाओ।
आज गुरू जी से जो सीखा, पूरा-पूरा पाठ सुनाओ।
बबलू, वसुधा, राम, कन्हैया। अक्का बक्का तीन तलैया।

सूरज लो सिर पर चढ़ आया, चलो वहाँ है ठंढी छाया।
गोल गोलाई में बैठो सब, नाचेगी अब नन्हीं माया।
छम-छम, छम–छम ताता–थैया। अक्का बक्का तीन तलैया।

हरे खेत पर उजली चादर, चादर पर नीला सा चक्कर।
सबसे ऊपर नारंगी सा, रंग लगा है सुन्दर–सुन्दर।
जो बूझे वह रूप रूपैया। अक्का बक्का तीन तलैया।

सबसे प्यारा अपना देश, और देश का यह परिवेश।
बच्चो, इसको याद रखो तो, और नहीं कुछ कहना शेष।
जय भारत, जय धरती मैया। अक्का बक्का तीन तलैया।