जंगल की पुकार
कितना हरा भरा हूं मैं ।
कितना खिला खिला हूं मैं।
मेरे अंदर इक संसार।
पक्षी उड़ते पंख पसार।
भांति- भांति के पशु यहां।
जड़ी बूटियां यहां वहां।
मेरे कारण वर्षा आए ।
राह बाढ़ की भी रुक जाए।
औषधि का मुझ में भंडार।
काग़ज़ लकड़ी का मैं द्वार।
इतना सब कुछ मैं देता हूं ।
फिर भी डर में ही जीता हूं ।
जाने कब ये मानव आएँ
पेड़ कटे, पंक्षी उड़ जाएँ।
पशु मेरे बेघर हो-हो कर ।
भटके यहाँ वहाँ रो-रो कर।
हे मानव ! मुझ को काटोगे।
वर्षा का सुख ले न सकोगे।
बाढ़ नहीं फिर रोक सकोगे।
स्वच्छ हवा को भी तरसोगे।
सुख से जीना है यदि बच्चो।
मुझ को भी सुख से जीने दो ।
-इस्मत ज़ैदी-



