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वो गूगल में खोज रहा था, राम नाम है कैसे जपना।

बंदर ने देखा ये सपना

 
बंदर ने देखा ये सपना 
लैपटॉप है उसका अपना। 
वो गूगल में खोज रहा था 
राम नाम है कैसे जपना। 

बेटा बोला पापा छोड़ो 
फेसबूक में खाता खोलो 
सारा जंगल होगा अपना। 

तभी बंदरिया डंडा लाई 
लैपटॉप की करी पिटाई 
बोली ये दुष्मन है अपना। 

सब पेड़ों में मीठे फल हों 
सब नदियों में मीठा जल हो 
आंख खुली तो सोचे बंदर 
कैसे पूरा हो ये सपना।

उसी पहाड़ी के ढ़लान पर...

चाह हमारी... 
प्रभात गुप्‍त 

छोटी एक पहाड़ी होती, झरना एक वहां पर होता 
उसी पहाड़ी के ढ़लान पर काश हमारा घर भी होता। 
 
बगिया होती जहां मनोहर खिलते जिसमें सुंदर फूल 
बड़ा मजा आता जो होता वहीं कहीं अपना स्‍कूल।

झरनों के शीतल पानी में घंटो खूब नहाया करते 
नदी पहाड़ों झोपडि़यों के सुंदर चित्र बनाया करते। 

होते बाग सेब चीकू के थोड़ा होता नीम बबूल 
बड़ा मजा आता जो होता वहीं कहीं अपना स्‍कूल। 

सीढ़ी जैसे खेत धान के और कहीं केसर की क्‍यारी 
वहां न होता शहर भीड़ का, धुआं उगलती मोटरगाड़ी।

सिर पर सदा घटाएं काली पांवों में नदिया के कूल 
बड़ा मजा आता जो होता वहीं कहीं अपना स्‍कूल।

आया राखी का त्‍यौहार

 
आया राखी का त्‍यौहार 
डॉ0 देशबंधु शाहजहाँपुरी 

खुशियों का लेकर उपहार
आया राखी का त्‍यौहार। 

जूही ने गेंदा, गुलाब के, 
तिलक लगा आशीष दिया। 

तब तक खुश्‍बू बिखराना तुम, 
जब तक चली न जाए बहार। 

होठों पर मुस्‍कान बिछाकर, 
बहनें बाँध रहीं राखी। 

नहीं चाहिए उनको कुछ भी, 
केवल माँगें प्‍यार-दुलार। 

प्‍यारे भइया जग-सागर में, 
खेना तुम रक्षा की नाव। 

दुख की भंवर मिले यदि कोई, 
छोड़ न देना तुम पतवार।

...गर्मी को पानी से धोएँ, बारिश को हम खूब सुखाएँ

 
उनका मौसम
देवेन्‍द्र कुमार

गर्मी को पानी से धोएँ
बारिश को हम खूब सुखाएँ

जाड़े को फिर सेंक धूप से
अपनी दादी को खिलवाएँ।

कैसा भी मौसम हो जाए
उनको सदा शिकायत रहती

इससे तो अच्‍छा यह होगा
उनका मौसम नया बनाएँ।

कम दिखता है, दाँत नहीं है,
पैरों से भी चल न पातीं

बैठी-बैठी रटती रहतीं
न जाने कब राम उठाएँ।

शुभ-शुभ बोलो प्‍यारी दादी,
 दर्द भूलकर हँस दो थोड़ा

आँख मूँदकर देखो अब तुम
 हम सब मिलकर लोरी गाएँ।

बाबा की बातें रंगीन

बातें हैं रंगीन
देवेन्‍द्र कुमार 

बाबा के हैं बाल सफेद
पर उनकी बातें रंगीन।

सुबह टहलने रोज निकलते 
अपने काम सभी खुद करते 
छत पर उनकी कसरत का तो 
मजेदार होता है सीन। 

हरदम कुछ-कुछ करते रहते 
दादी से बिन बात झगड़ते 
नकली दाँत दिखाकर पूँछे 
मुँह में दाँत बचे क्‍यों तीन। 

रोज कहानी हमें सुनाते 
अपने बचपन में ले जाते 
बोले, अब दुनिया घूमूँगा 
कल सपने में देखा चीन।

बादल जी, बोलो क्‍या तुम भी पढ़ने जाया करते हो?

बादल जी, बोलो क्‍या तुम भी पढ़ने जाया करते हो?
या फिर केवल गड़-गड़-गड़ शोर मचाया करते हो? ?

सुबह-सुबह मुझको तो मेरी मम्‍मी रोज जगा देती,
अलसाई आँखों से मीठे सपने दूर भगा देती,

देर हुई विद्यालय मे तो टीचर अलग सजा देती,
कहो, किसी से सजा कभी क्‍या तुम भी पाया करते हो?

सुनते हैं तुमको ऊपर से सारी दुनिया दिखती है,
बोलो, क्‍या सचमुच ऊपर से प्‍यारी दुनिया दिखती है?

फूलों जैसी सुंदर राजकुमारी दुनिया दिखती है ?
जिसपर तुम अपने आँचल की ठण्‍डी छाया करते हो?
नील गगन में रहते हो तुम तो हो जाते सैलानी,
प्‍यारी धरती के होठों को छूकर हो जाते पानी,

 कभी-कभी तो तुम्‍हें देखकर होने लगती हैरानी,
 इन्‍द्रधनुष के रंग किस तरह तुम बिखराया करते हो?

साल शुरू हो दूध दही से, साल खत्म हो शक्कर घी से।

-भवानी प्रसाद मिश्र-

साल शुरू हो दूध दही से
साल खत्म हो शक्कर घी से।

पिपरमैंट, बिस्कुट मिसरी से
रहें लबालव दोनों खींसे।।

मस्त रहें सड़कों पर खेलें
ऊधम करें मचाएँ हल्ला
रहें सुखी भीतर से जी से।

साँझ, रात, दोपहर, सवेरा
सबमें हो मस्ती का डेरा।

कातें सूत बनाएँ कपड़े,
दुनिया में क्यों डरें किसी से।

पंछी गीत सुनाये हमको
बादल बिजली भाये हमको
करें दोस्ती पेड़ फूल से ।

लहर-लहर से नदी-नदी से
आगे पीछे ऊपर नीचे।
रहें हंसी की रेखा खींचे।

पास पड़ौस गाँव घर बस्ती
प्यार ढेर भर करें सभी से।

बातों-बातों में ही तुमने, मारे डंक बहत्तर जी ।


सुनो-सुनो ओ मच्छर जी।
हो तुम कितने निष्ठुर जी।

बातों-बातों में ही तुमने,
मारे डंक बहत्तर जी ।

नन्हे नाजुक लगते हो,
पर दिल के पूरे पत्थर जी।

पाठ पढे़ ना दया-धरम का,
हो तुम निपट निरक्षर जी ।

पढ़ने दो ना लिखने दो,
ना कहीं चैन से सोने दो।

करके रखा नाक में दम,
यह ठीक नहीं है मिस्टर जी।

कछुआ-वछुआ मार्टिन-आर्टिन,
सब उपाय बेकार हुए।

मच्छरदानी में भी आ जाते
हो, कितने मट्ठर जी ?

लेकिन एक बात पर अपनी,
अकल खा रही चक्कर जी।

क्या मिलता है तुम्हें खून में,
घुली हुई क्या शक्कर जी ?

अले, छुबह हो गई।

 अले, छुबह हो गई, आँगन बुहाल लूं,
मम्मी के कमले की तीदें थमाल लूँ।

कपले ये धूल भले, मैले हैं यहाँ।
ताय भी बनाना है, पानी भी लाना है।

पप्पू की छर्ट फटी, दो ताँके दाल लूं।

कलना है दूध गलम, फिर लाऊं तोस्त नलम।
झट छे इछतोब जला, बलतन फिल एक चढ़ा।

कल के ये पले हुए आलू उबाल लूँ।

आ गया ‘पलाग’ नया, काम छभी भूल गया।
जल्दी में क्या कल लूँ, चुपके से अब भग लूँ।

छंपादक दादा के नए हाल-चाल लूँ।

बापू तुम्हें कहूं मैं बाबा, या फिर बोलूं नाना?

 बाल गीत

बापू तुम्हें कहूं मैं बाबा, या फिर बोलूं नाना?
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।।

छड़ी हाथ में लेकरके तुम, सदा साथ क्यों चलते?
दांत आपके कहां गये, क्यों धोती एक पहनते?

हमें बताओ आखिर कैसे, तुम खाते थे खाना?
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।।

टीचर कहते हैं तुमने भारत आज़ाद कराया।
एक छड़ी से तुमने था दुश्मन मार भगाया।

कैसे ये हो गया अजूबा मुझे जरा समझाना।
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।। 

भोला–भाला सा मैं बालक, अक्ल मेरी है थोड़ी।
कह देता हूं बात वही जो, आती याद निगोड़ी।

लग जाए गर बात बुरी तो रूठ नहीं तुम जाना।
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।

- ज़ाकिर अली 'रजनीश'

गिरधर भैया अपने हाथों पाती मुझको लिखना

–डा0 मोहम्मद अरशाद खान–
गिरधर भैया अपने हाथों पाती मुझको लिखना।

लिखना अबकी बार खेत में, कैसे आए धान।
देर रात तक दादा गाते, अब भी लम्बी धान?

गऊघाट के मेले से तुम, क्या–क्या लेकर आए?
काली गाय के बछड़े क्या बड़े–बड़े हो आए?

साँझ ढ़ले तक खेल–खेलते, अब भी सुखना–दुखना?
गिरधर भैया अपने हाथों पाती मुझको लिखना।

चौपालों में देर रात तक, होते हंसी–ठहाके?
क्या रामू काका मानस की, चौपाई हैं गाते?

बूढ़े दादा से तुम सबने, कितनी सुनी कहानी?
लिखना उनसे बात ज्ञान की, तुमने कितन जानी।

सीख लिया अब कल्लू ने क्या, अ–आ–इ–ई पढ़ना?
गिरधर भैया अपने हाथों पाती मुझको लिखना।

जल्दी करना देर न करना, पाती झट भिजवाना।
टूटी–फूटी भाषा में ही, सबका हाल बताना।

फिर मत पूछो पाती पाकर, मन कितना खुश होगा।
नहीं दिया पाती, सोचो, दुख मुझको कितना होगा?

हरकारे की राह ताकती, रहती तेरी बहना।
गिरधर भैया अपने हाथों पाती मुझको लिखना।

कब तक मैं ढ़ोऊंगा मम्मी, यह बस्ते का भार?



कब तक मैं ढ़ोऊंगा मम्मी, यह बस्ते का भार?

मन करता है तितली के पीछे मैं दौड़ लगाऊं।
चिडियों वाले पंख लगाकर अम्बर में उड़ जाऊं।

साईकिल लेकर जा पहुंचूं मैं परी–लोक के द्वार।
कब तक मैं ढ़ोऊंगा मम्मी, यह बस्ते का भार?

कर लेने दो मुझको भी थोड़ी सी शैतानी।
मार लगाकर मुझको, मत याद दिलाओ नानी।

बिस्किट टॉफी के संग दे दो, बस थोड़ा सा प्यार।
कब तक मैं ढ़ोऊंगा मम्मी, यह बस्ते का भार?


 Admin - Scientific World
 चित्र साभार-http://www.acclaimimages.com/