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फूलों से होते हैं बच्चे, सच है ये। और सभी होते हैं अच्छे, सच है ये।


- डा0 अजय जनमेजय -

फूलों से होते हैं बच्चे, सच है ये।
और सभी होते हैं अच्छे, सच है ये।

इक पल रूठें तो दूजे पल हंसते हैं,
मानो मुस्कानों के लच्छे, सच है ये।

इनकी आँखों में खुद को पढ़ सकते हो,
दरपन जैसे बिलकुल सच्चे, सच है ये।

जो सोचें वो करके ही दम लेते हैं,
अपनी धुन के पूरे पक्के, सच है ये।

इतना खेलें भागे-दौड़ें सांस चढ़ी,
कब बैठे हैं फिर भी थक के, सच है ये।

मन के भोले दिल में भी तो भेद नहीं,
सब जैसे माना के मनके, सच है ये।

हम धरती के फूल, हमीं हैं खुश्बू वाले झरने।


-कृष्ण शलभ-
हम धरती के फूल, हमीं हैं खुश्बू वाले झरने।

उड़े हवा के पंख लगा कर, कोई क्या उड़ पाए।
गुस्सा होती दादी अम्मा हमें देख हंस जाए।

बिना हमारे दादी माँ को घर भर लगे अखरने।
अम्मा की लोरी, बाबा की किस्सों भरी ‍िकताब।

चाचा नेहरू की अचकन के हम ही रहे गुलाब।
जहाँ–जहाँ हम जाएं भैया मस्ती लगे बिखरने।

सूरदास केहमीं कन्हैया हम तुलसी के राम।
वीर शिवा, बन्दा बैरागी सभी हमारे नाम।

हम कच्ची मिट्टी हैं जैसा चाहो लगे संवरने।

लाला जी की बड़ी तोंद है, घंटाघर की घड़ी तोंद है।


-सूर्यभानु गुप्त-

लाला जी की बड़ी तोंद है।
घंटाघर की घड़ी तोंद है।।

लाला जी से मिलो बाद में,
उनसे पहले खड़ी तोंद है।

कुरते में घुसने से पहले,
रोज लड़ाई लड़ी तोंद है।

बस में चढ़ते और उतरते,
दरवाजे में अड़ी तोंद है।

किसी अंगूठी में ज्यों हीरा,
लाला जी में जड़ी तोंद है।

बच्चे-बूढ़े सभी छुड़ाते,
हाथ लगी फलझड़ी तोंद है।

चंदा मामा, चंदा मामा, मामी जी कब लाओगे?


-सूर्यभानु गुप्त-

चंदा मामा, चंदा मामा, मामी जी कब लाओगे?
दूध-भात भांजों का अपने, बोलो कब तक खाओगे?

चंदा मामा, चंदा मामा, लगते कितने प्यारे हो।
लेकिन यह बतलाओ अब तक, तुम क्यों भला कुंवारे हो।

चंदा मामा, चंदा मामा, मानो बात हमारी भी।
ब्याह रचाओ, मामी लाओ, किरणों की फुलवारी सी।

चंदा मामा, चंदा मामा, मामी जी जब आएंगी।
आकर रोज तुम्हारी खातिर, पूड़ी-खीर बनाएंगी।

चंदा मामा, चंदा मामा, हम राकेट में आएंगे।
मामी के हाथों की आकर, पूड़ी-खीर उड़ाएंगे।

लगते हैं केले के पत्ते, हाथी जैसे कान



-सुरेश विमल-
लगते हैं केले के पत्ते, हाथी जैसे कान।

पीपल के पत्तों की होती चूहे जैसी पूँछ,
ताड़-वृक्ष के पत्ते लगते रावण की सी मूँछ।
पात कमल के देख-देख आता कछुए का ध्यान।

दिखते हैं खटमल जैसे पत्ते हैं इमली के,
सेही के शरीर से होते पत्ते नागफनी के।
पात खजूरों के लगते हैं तरकस के-से बान।

बढ़ा-बढ़ा नाखून, चबाना उन्हें दांत से, छी: छी:



-सुरेश विमल-

बढ़ा-बढ़ा नाखून, चबाना उन्हें दांत से, छी: छी:
बड़-बड़े बालों में पंजें डाल खुजाना, छी: छी:

केले खाकर छिलके देना फेंक सड़क पर, छी: छी:
मक्खी भरे खोमचों से खा लेना चीजें, छी: छी:

मैले कपड़े पहन घूमना नहीं नहाना, छी: छी:
दातुन-कुल्ला किए बिना ही बिस्कुट खना, छी: छी:

धूल भरी गलियों में जाकर दौड़ लगाना, छी: छी:
गंदे पानी में कागज की नाव चलाना, छी: छी:

मेरे ही जलने से होती, दुनिया में दीवाली।



- डॉ0 तारादत्त 'निर्विरोध' -

हवा भले ही तेज चले या आए आँधी काली।
मेरे ही जलने से होती, दुनिया में दीवाली।

जलना तो जीवन है मेरा, और उमर उमर है बाती।
जलता हूँ जब रात-रात भर, नई भोर तब आती।

मेरे जलते तन को देखों, फिर देखो मुस्काना।
औरों के हित मिट जाने में मैं सुख को जाना।

अंधियारे को दूर भगाने सूरज बन कर आता।
दीपक बोला, जब जलता हूँ उजियाला फैलाता।

लड्डू-पेड़े से दिन होते, रसगुल्ले सी रातें।


-रोहिताश्व अस्थाना-

लड्डू-पेड़े से दिन होते, रसगुल्ले सी रातें।
तब कितना खुश होते हम सब मिलकर मौज मनाते।

गरम जलेबी से यदि होती अपनी शुरू पढ़ाई।
तब तो दिन भर में सचमुच सारी किताब पढ़ जाते।

गेंद सेब की होती, गन्ने का होता यदि बल्ला,
विकेट खूब लेते हम चौके-छक्के खूब बनाते।

मीठे आमों के बागों में पड़ते अगर पहाड़ा,
गणित हमें हलवा-सा लगता अच्छे नम्बर पाते।

सुबह-शाम मम्मी यदि देती हमको शक्करपारे,
तो हम कोयल के भाई बन बोली मधुर सुनाते।

पानी मत बरसाने लगना, शादी में तुम झमर-झमर


-नागेश पाण्डेय 'संजय'-
बादल भैया, बादल भैया, मैं छोटी सी बच्ची हूँ।
नहीं किसी से झग़ड़ा करती, सब कहते मैं अच्छी हूँ।

बादल भैया, बादल भैया, मैं पढ़ने भी जाती हूँ।
खूब लगन से पढ़ती हूँ मैं, अव्वल नम्बर पाती हूँ।

बादल भैया, बादल भैया, पास हमारे है गुडिया।
गुडिया बड़ी हो रही है, डर है न हो जाए बुढिया।

बादल भैया, बादल भैया, करनी है इसकी शादी।
धूम-धाम से शादी करने की है मुझको आजादी।

बादल भैया, बादल भैया, शादी में सब आएंगे।
दावत होगी, ढ़ोल बजेंगे, सब मिलकर नाचे गाएंगे।

बादल भैया, बादल भैया, पर लगता है मुझको डर।
पानी मत बरसाने लगना, शादी में तुम झमर-झमर।

बादल भैया, बादल भैया, तुम तो अच्छे भैया हो।
शादी ढ़ंग से हो जाए, बस तुम ही पार-लगैया हो।

चित्र साभार- http://photo.net/

चूहा कूदा गंगा जी में

–सूर्य कुमार पाण्डेय–

बिल्ली मौसी चलीं बनारस, लकर झोला–डंडा।
गंगा–तट पर मिला उन्हें तब मोटा चूहा पंडा।

चूहा बोला– बिल्ली मौसी, चलो करा दूं पूजा।
मुझ–सा पंडा, यहाँ घाट पर, नहीं मिलेगा दूजा।

बिल्ली बोली– ओ पंडा जी, भूख लगी है भारी।
पूजा नहीं, पेट पूजा की करो तुरन्त तैयारी।

समझ गया चूहा, बिल्ली मौसी का पंगा जी में।
टीका–चंदन छोड़ घाट पर कूदा गंगा जी में।

चंदा मामा, आ जाओ, साथ मुझे कल ले जाओ


-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी-

चंदा मामा, जाओ, साथ मुझे कल ले जाओ।

कल से मेरी छुट्टी है ना आये तो कुट्टी है।

चंदा मामा खाते लड्डू, आसमान की थाली में।
लेकिन वे पीते हैं पानी आकर मेरी प्याली में।

चंदा देता हमें चाँदनी, सूरज देता धूप।
मेरी अम्मा मुझे पिलातीं, बना टमाटर सूप।

थपकी दे-दे कर जब अम्मा, मुझे सुलाती रात में।
सो जाता चंदा मामा से, करता-करता बात मैं।


चंदा मामा, जाओ, साथ मुझे कल ले जाओ।

कल से मेरी छुट्टी है ना आये तो कुट्टी है।

चंदा मामा खाते लड्डू, आसमान की थाली में।
लेकिन वे पीते हैं पानी आकर मेरी प्याली में।

चंदा देता हमें चाँदनी, सूरज देता धूप।
मेरी अम्मा मुझे पिलातीं, बना टमाटर सूप।

थपकी दे-दे कर जब अम्मा, मुझे सुलाती रात में।
सो जाता चंदा मामा से, करता-करता बात मैं।

अरी चिरइया नींद की, हो जा जल्‍दी फुर्र


काना बाती कुर्र
-कुँअर बेचैन -

अरी चिरइया नींद की, हो जा जल्‍दी फुर्र।
काना बाती कुर्र।

छोड़ अपने आराम को, सूरज निकला काम को,
देकर सबको रोशनी, घर लौटेगा शाम को।
तू भी जल्‍दी छोड़ दे खर्राटों की खुर्र।
काना बाती कुर्र।

जगीं शहर की मंडियॉं, गॉंवों की पगडंडियॉं,
खेतों ने भी दिखलाईं हरी फसल की झंडियॉं।
चली सड़क पर मोटरें, घर घर घर घर घुर्र।
काना बाती कुर्र।

कविवर तोंदू राम बुदक्कड़, कभी कभी आ जाते हैं

-हरिकृष्ण देवसरे-
कविवर तोंदू राम बुदक्कड़,
कभी कभी आ जाते हैं।

खड़ी निरंतर रहती चोटी,
आँखें धंसी, मिचमिची छोटी,
नाक चायदानी की टोंटी,
अंग गंग की छटा निराली
भारी तोंद हिलाते हैं।

कंधे पर लाठी बेचारी,
लटका उसमें पोथी भारी,
लिये हाथ में सुंघनी प्यारी,
सूँघ सूँघकर आ छीं आ छीं
का आनन्द उठाते हैं।

ये है नियमी धर्म धुरंधर,
गायक गुपचुप भाँड उजागर,
परम स्वतंत्र, न नौकर चाकर,
झूम झूमकर मटर मटक कर,
हलुआ पूरी खाते हैं।

कविता का बँध जाता ताँता,
चप्पल का विवाह ठन जाता,
जूता दूल्हा बनकर आता,
बिल्ली रानी, पिस्सू राजा
का भी जोड़ मिलाते हैं।
चित्र साभार- http://in.jagran.yahoo.com/

सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो

छुटटी नहीं मनाते हो
-कृष्‍ण शलभ-

सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो ?

लगता तुमको नींद न आती, और न कोई काम तुम्‍हें। 
जरा नहीं भाता क्‍या मेरा, बिस्‍तर पर आराम तुम्‍हें। 

खुद तो जल्‍दी उठते ही हो, मुझे उठाते हो। 
सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो। 

कब सोते हो, कब उठते हो, कहॉं नहाते धाते हो?
तुम तैयार बताओ हमको, कैसे झटपट होते हो ?

लाते नहीं टिफिन, क्‍या खाना खाकर आते हो। 
सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो। 

रविवार ऑफिस बंद रहता, मंगल को बाजार भी। 
कभी कभी छुटटी कर लेता, पापा का अखबार भी। 

ये क्‍या बात, तुम्‍हीं बस छुटटी नहीं मनाते हो।
सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो ?
चित्र साभार-http://www.flickr.com/

मजेदार लगते हैं कितने यार, बताशे पानी के

बताशे पानी के 
-सुंदरलाल अरूणेश-

मजेदार लगते हैं कितने यार, बताशे पानी के। 
देता लच्‍छूराम रूपये में चार बताशे पानी के। 

इनका पानी याद करो, तो मुँह में भर आता पानी, 
इन्‍हें गोलगप्‍पा भी कहते, सूरत जानी पहचानी। 
इसीलिए पाते हैं सबका प्‍यार, बताशे पानी के।

थोड़ी मिली खटाई इसमें, खुश्‍बूदार मसाला है, 
टिक्‍की, खस्‍ता से भी बढ़कर इनका स्‍वाद निराला है। 
पापड़ जैसे कड़क कुरमुरे यार बताशे पानी के।

देर नहीं लगती है, मुँह में रखते ही ये घुल जाते, 
कभी कभी मम्‍मी पापा भी इन्‍हें देखकर ललचाते। 
खाओ भी चटपटे जायकेदार बताशे पानी के।

बस्‍ता मुझसे भारी है

-अवश्‍घोष-

यह कैसी लाचारी है 
बस्‍ता मुझसे भारी है।

कंधा रोज भड़कता है, जाने क्‍या क्‍या बकता है,
लाइलाज बीमारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

जब भी मैं पढ़ने जाता, जगह जगह ठोकर खाता,
बस्‍ता क्‍या अलमारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

कान फटे सुनते सहते, मुझे देखकर सब कहते,
बालक नहीं, मदारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

ये जामुन काले काले हैं

 -विनोदचंद्र पाण्‍डेय ‘विनोद’-

ये जामुन काले काले हैं। 

जब बादल जल बरसाते हैं, ये पेड़ों पर पक जाते हैं,
भौरों सा रूप दिखाते हैं, करते सबको मतवाले हैं।

होते सब खूब रसीले हैं, बैंगनी, लाल या नीले हैं,
सब के सब रंग रंगीले हैं, सुंदर सुकुमार निराले हैं।

देखो, डालों पर लटके हैं, गिरते जब लगते झटके हैं,
बच्‍चे खाते डट डट के हैं, बेचते इन्‍हें फलवाले हैं।

मानो रस में ही पगते हैं, सबको ही अच्‍छे लगते हैं,
ले भी लो बिलकुल सस्‍ते हैं, सब पर जादू सा डाले हैं।

प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो

-रामसेवक शर्मा- 
प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो। 
 बादल भैया प्‍यासी बुढिया पानी दो।

पिछली बार बहुत कम बरसे तरसे हम। 
अब की बार बरसना जमके हरषें हम। 

प्‍यासी प्‍यासी नीम निबरिया पानी दो।
 प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो।

उठा घटाऍं काली काली अड़ अड़ धम। 
गरज गरज के बरसो ऑंगन झर झर झम। 

प्‍यासी प्‍यासी ताल मछरिया पानी दो।
प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो। 

झूलों का मौसम आएगा झूलेंगे। 
पेंग बढ़ाके आसमान को छू लेंगे। 

प्‍यासी प्‍यासी श्‍याम कुयलिया पानी दो।
प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो।
चित्र साभार- http://openfsm.net

धरती माँग रही है पानी, बादल बरसो

-राधेश्याम प्रगल्भ-

धरती माँग रही है पानी, बादल बरसो।
फूटे अंकुर मिले जवानी, बादल बरसो।
पहनेगी यह चूनर धानी, बादल बरसो।
बहल जाएगी गुडिया रानी, बादल बरसो।

भीगेंगे हम सब फुहार में, बादल बरसो।
रंग आ जाएगा बहार में, बादल बरसो।
गाएगा कोई मल्हार में, बादल बरसो।
रोगी मुस्कान बुखार में, बादल बरसो।

फूलों पर मुस्कान खिलेगी, बादल बरसो।
बच्चों की टोली किलकेगी, बादल बरसो।
गली गली धारा मचलेगी, बादल बरसो।
कागज की नौका तैरेगी, बादल बरसो।

देख रहे हम कब से राहें, देखो, बरसो।
खड़े हुए फैलाए बाँहें, देखो, बरसो।
पूरी होंगी अनगिन चाहें, देखो, बरसो।
तुम पर हसरत भरी निगाहें, देखो, बरसो।

जादू की पु‍डिया सा मौसम


कभी ताड़ सा लम्बा दिन है कभी सींक सा लगता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

कुहरा कभी टूट कर पड़ता, चलती कभी हवाएं।
आए कभी यूं आंधी कि कुछ समझ में नहीं आए।

जमने लगता खून कभी तो सूरज कभी पिघलता।।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

कभी बिकें अंगूर, अनार व कभी फलों का राजा।
कभी – कभी हैं बिकते जामुन बाज़ारों में ताज़ा।

लीची आज और कल आड़ू, मस्ती भरा उछलता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

बढ़ता जाता समय तेज गति हर कोई बतलाए।
छूट गया जो पीछे, वो फिर लौट कभी न आए।

पछताए वो, काम समय से जो अपना न करता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

- ज़ाकिर अली 'रजनीश'
महामंत्री- साइंटिफिक वर्ल्‍ड, साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन