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जूते की पुकार...

जूते की पुकार
रमेश तैलंग


फट गया हूं मैं तले से, कट गया हूं मैं गले से
लद गया मेरा जमाना, हो गया हूं अब पुराना
आ पड़ी है जान पर, रुकने लगे सब काम मेरे
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

एक बूढ़े दादा जी हैं, छोड़ते मुझको नहीं हैं
थक गया हूं रोज कहकर, चल रहा हूं बस घिसटकर
व्यर्थ ही, लगता, गए सब मिन्नतें, 'परनाम' मेरे
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

ऑपरेशन की जरूरत, है यही बचने की सूरत
देर कर दी और थोड़ी, जान जायेगी निगोडी
वो कबाड़ी भी न देगा चार पैसे दाम मेरे
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

10 टिप्पणियाँ:

Anonymous said...

Majedar Kavita hai.

Minakshi Pant, Ludhiyana

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत ही सुंदर बाल रचना

Jyoti Mishra said...

fantastically written...
loved the hidden sarcasm in it.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति!

चंदन कुमार मिश्र said...

जूते पर ऐसी कविता! बढिया। प्रवाहमयी।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

भई वाह ,पढ कर मन खुश होगया ।

रमेश तैलंग said...

सभी सहृदय सुविग्यों का हार्दिक आभार जिन्होंने इस बाल कविता को पसंद किया और अपनी प्रतिक्रियाओं से मुझे उपकृत किया. -रमेश तैलंग

सुधाकल्प said...

मैं यह सोच रही हूँ ---अगर बच्चे अभिनय के साथ इस बाल गीत के बोल बोलेंगे तो कितने अच्छे लगेंगे I

हो कहाँ ,मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे

-----|

veerubhai said...

सुन्दर मनोहर .एक प्रवृत्ति का उदघाटन करती बेहतरीन रचना ....दादा जी का जूता ...

Pavitra_Hyd said...

joote par rochak kavita

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