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मेरा बस्‍ता कितना भारी # रूपचंद शास्‍त्री 'मयंक'

मेरा बस्‍ता कितना भारी

मेरा बस्‍ता कितना भारी। 
बोझ उठाना है लाचारी। 

मेरा तो नन्‍हा सा मन है। 
छोटी बुद्धि दुर्बल तन है। 

रोज रोज विद्यालय जाना। 
बड़ा कठिन है भार उठाना। 

कंप्‍यूटर का युग अब आया। 
इसमें सारा ज्ञान समाया। 

मोटी पोथी सभी हटा दो। 
बस्‍ते का अब भार घटा दो। 

कम्‍प्‍यूटर जी पाठ पढ़ायें। 
हम बच्‍चों का ज्ञान बढ़ायें।।

बगुला भगत : रूपचंद्र शास्‍त्री मयंक

बाल कविता-बगुला भगत

बगुला भगत बना है कैसा।
लगता एक तपस्‍वी जैसा।

अपनी धुन में अड़ा हुआ है। 
एक टांग पर खड़ा हुआ है। 

धवल दूध सा उजला तन है। 
जिसमें बसता काला मन है। 

मीनों के कुल का घाती है। 
नेता जी का यह नाती है। 

वैठा यह तालाब किनारे। 
छिपी मछलियां डर के मारे। 

आंख मूंद कर सोच रहा है। 
पंखों को यह नोच रहा है। 

मछली अगर नजर आ जाये। 
मार झपट्टा यह खा जाये। 

इसे देख धोखा मत खाना। 
यह ढ़ोंगी है जाना माना।