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राजा तेरे राजमहल का, रस्‍ता मेरे गाँव से।

मेरे गाँव से 
-धन सिंह मेहता ‘अनजान’ 

राजा तेरे राजमहल का, रस्‍ता मेरे गाँव से। 
है छोटा पदचिन्‍ह तुम्‍हारा राजा मेरे गाँव से।। 

पीठ हमारी, कोड़ा तेरा, रा हमारी रोड़ा तेरा। 
चना हमारा, घोड़ा तेरा, खाता मेरे गाँव से।। 

बाग हमारे, फूल तुम्‍हारे, पाँव हमारे, शूल तुम्‍हारे। 
नदी हमारी, गूल तुम्‍हारी, बस्‍ती मेरे गाँव से।। 

जंगल अपना, घास तुम्‍हारी, हवा हमारी साँस तुम्‍हारी। 
पानी अपना, प्‍यास तुम्‍हारी, बुझती मेरे गाँव से।। 

Keywords: Dhansingh Mehta Anjan, Bal Kavita, Balgeet, Children Nursery Rhymes, Children Poetry, Indian Children's Poem

Post Written by +DrZakir Ali Rajnish

4 टिप्पणियाँ:

ओमप्रकाश कश्यप said...

यह प्रतीकात्मक कविता है. संभवत: बालकविता से आगे की चीज. बालक जनशोषण की व्यापक प्रविधियों को शुरू से ही जान लें, यह भी अच्छा है. कविता में आसान शब्दों का प्रयोग इसकी ग्राह्यता और प्रभावकता को बढ़ाता है. आपको और मेहता जी बधाई.

दिगम्बर नासवा said...

वाह ... बहुत ही प्रभावी ... बाल मन की मानसिकता के आदार पे लिखी ...

Virendra Kumar Sharma said...

रूपकात्मक तत्वों से लैस है यह कविता व्यवस्था गत शोषण का कच्चा चिठ्ठा लिए है .आभार इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए .

Sunitamohan said...

bahut arthpurn aur sundar kavita hai. aapki rachnayen padhne me mazaa aa raha hai!yahi to hota aya hai ab tak prajaa ke boote raaja ki mauj!

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