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...करते रहते ता-ता धिन्‍ना।

छोटा होना बहुत बुरा है
-अश्‍वनी कुमार पाठक

भैया कहता मुझको पिन्‍ना। 
दीदी कहती कितना घिन्‍ना।

साथी मुझे बनाते घोड़ा, और लगाते कसकर कोड़ा।
क‍हते कितना मरियल-अडि़यल, सरपट चलता नहीं निगोड़ा।
गोलू, भोलू सदा पीठ पर, करते रहते ता-ता धिन्‍ना।

मुझको कहते सभी अनाड़ी, खुद को मानें मँजा खिलाड़ी।
खतरे से हो जहाँ खेलना, कर देते हैं मुझे अगाड़ी।
ढ़ोल बजाते ढम ढम ढम ढम, टमकी बोले तड़-तड़ दिन्‍ना।

सबकी नजरों का मैं काँटा, खाता रहता दिन भर चाँटा।
 छोटा होना बहुत बुरा है, कभी किसी ने दर्द न बाँटा।
 तंग बहुत करते हैं मुझको, छोटू-मोटू, बिन्‍नी-बिन्‍ना।

 भैया कहता मुझको पिन्‍ना। 
दीदी कहती कितना घिन्‍ना।

5 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर बाल रचना!

"रुनझुन" said...

बहुत ही मज़ेदार बाल-कविता!... लेकिन अंकल छोटा होना इतना भी तो बुरा नहीं उसके बहुत सारे फायदे भी हैं और बड़ा होना भी तो काम दुखदायी नहीं ना...?

S.N SHUKLA said...

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति , बधाई .

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

bahut pyare blog par pyari balopyogi rachna,sunder ,ati sunder

"जाटदेवता" संदीप पवाँर said...

बेहतरीन

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