Pages

Subscribe:

Ads 468x60px

test ad

क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये?

 
क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये ? 
अश्‍वनी कुमार पाठक 

क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये ? 
किस अलबेले चित्रकार से, तुमने पंख रंगाये ? 

क्‍यों कहते हैं बच्‍चे तुमको, तितली, तितली रानी? 
क्‍यों लगती तुम उनको इतनी, प्‍यारी और सुहानी? 

तुम्‍हें देखकर मुन्‍ना-मुन्‍नी, नन्‍हें हाथ बढ़ाते। 
 पंख तुम्‍हारे चुटकी में, आते-आते रह जाते। 

तुम फूलों पर बैठ-बैठ कर, मीठा रस पीती हो। 
 भौरों से बतियाती रहती, मस्‍ती में जीती हो।

8 टिप्पणियाँ:

veerubhai said...

क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये ?
किस अलबेले चित्रकार से, तुमने पंख रंगाये ?
सब नैनो टेक्नोलोजी का कमाल है भैया ,तितलियों और मोर पंख की नयनाभिराम छटाएं .बढ़िया बाल गीत .बधाई .कृपया यहाँ पधारें और शिरकत करें ,जाकिर भाई . रविवार, 22 अप्रैल 2012
कोणार्क सम्पूर्ण चिकित्सा तंत्र -- भाग तीन
कोणार्क सम्पूर्ण चिकित्सा तंत्र -- भाग तीन
डॉ. दाराल और शेखर जी के बीच का संवाद बड़ा ही रोचक बन पड़ा है, अतः मुझे यही उचित लगा कि इस संवाद श्रंखला को भाग --तीन के रूप में " ज्यों की त्यों धरी दीन्हीं चदरिया " वाले अंदाज़ में प्रस्तुत कर दू जिससे अन्य गुणी जन भी लाभान्वित हो सकेंगे |
वीरेंद्र शर्मा
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर बाल गीत...

Sunil Kumar said...

बहुत सुंदर बाल कविता रही तितलियों के रंगें पखों की बात यह तो अपनी समझ से बाहर हैं :)

sushma 'आहुति' said...

khubsurat geet....

Anurag Chanderi said...

very soft and fragile piece of a true
poetry, indded fantastic. congrates

Badal Merthi said...

जय हिन्द !

मंजु महिमा भटनागर said...

बहुत ही प्यारी कविता है?बिल्कुल बाल-मन की भाषा में.बधाई बच्चों की जुबां बनने के लिए.इसे पढ़ाकर वह गीत याद आगया'यह कौन चित्रकार है?'

veerubhai said...

बाल मन को लुभाती सांगीतिक रचना ......कृपया यहाँ भी पधारें -http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/05/blog-post_7883.html./http://veerubhai1947.blogspot.in/
शनिवार, 5 मई 2012
चिकित्सा में विकल्प की आधारभूत आवश्यकता : भाग - १


स्कूल में चरस और गांजा ,भुगतोगे भाई, खामियाजा

इस माह सर्वाधिक पढ़ी गयी कविताएँ